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Monday, April 25, 2011

हरेक बड़ा ब्लॉगर जानता है कि ‘उसका सम्मान उसके गन्ने से है।‘ Ganna

(पिछले सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए , गतांक से आगे )
1- अगर किसी को बड़ा ब्लॉगर बनना है तो क्या उसे औरत की अक्ल से सोचना चाहिए ? Hindi Blogging
2- कैसा होता है एक बड़े ब्लॉगर का वैवाहिक जीवन ? Family Life

आदमी की हक़ीक़त उसकी औरत ही जानती है और आदमी को भी अपनी हक़ीक़त तभी पता चलती है जबकि वह अपनी औरत का सामना करता है। औरत की ज़बान ही नहीं बल्कि उसकी अक्ल भी तेज़ चलती है। वह बदन से ज़रूर कमज़ोर होती है लेकिन फिर भी अपने मर्द पर वह भारी पड़ती है। बदन से भी उसे कमज़ोर रखा है उस बनाने वाले ने तो यह मर्दों पर उस मालिक का एक बड़ा अहसान है। अगर वह बदन से कमज़ोर न होती तो आज हरेक घर में कुश्ती चल रही होती और मर्द अपने हाथ-पैर और मुंह तुड़ाए बैठा होता। मालिक ने औरत को एक चीज़ में कम रखा तो उसे दूसरी चीज़ में बढ़ा दिया, उसे मां बना दिया, उसके दिल में प्यार का सागर रख दिया और यह सच है कि प्यार की दौलत के सामने बदन की ताक़त का दर्जा कम है। मालिक कम चीज़ लेता है तो ज़्यादा चीज़ देता है, हमेशा उसका उसूल यही है। मर्द इस राज़ को समझता तो अपनी ताक़त से वह औरत को फ़ायदा पहुंचाता और प्यार का जो ख़ज़ाना उसके पास है, उससे वह फ़ायदा उठाता। बहुत सी किताबें पढ़कर और नेक वलियों की सोहबत में बैठकर हमने यही जाना है। आदमी के लिए उसकी शरीके-हयात से अच्छा दोस्त, हमदर्द, मददगार और राज़दार दूसरा कोई होता ही नहीं। जब हम उलझन में होते हैं तो हम अपनी ख़ानम से ही काउंसिलिंग करते हैं और अल्लाह का शुक्र है कि उनकी सलाह सही होती है और काम करती है।
‘हिंदी ब्लॉगर्स सम्मेलन‘ के लिए आए निंमत्रण के बारे में भी उन्होंने जो कुछ कहा, सही कहा। हमने जान लिया कि जो भी हिंदी ब्लॉगर ख़ानदानी शरीफ़ होगा और गुटबाज़ी से दूर होगा वह तो इस सम्मेलन में जाएगा ही नहीं। हां, जिन्हें कुछ बेचना है या जिन्हें कुछ ख़रीदना है या अपने अच्छे ख़ासे-कुंवारेपन में चेंज दरकार है, वे ज़रूर इस हाट में ठाठ-बाट से पहुंचेगे और नहीं भी पहुंच पाएंगे तो इंटरनेट से ही ‘जलवों‘ का नज़ारा कर लेंगे। अभी तो शुरूआत है लेकिन आने वाले ‘सम्मान समारोहों‘ में हिंदी ब्लॉगर्स के लिए ‘चीयर लीडर्स‘ की तर्ज़ पर कुछ ‘चीयर ब्लॉगर्स‘ का भी इंतज़ाम कर लिया जाए तो हिंदी ब्लॉगिंग समय के साथ क़दम मिलाकर चलने लगेगी।
हम यह सब सोच ही रहे थे कि तभी कॉल बेल बजी। किसान और मज़दूर का दरवाज़ा आज भी हातिम ताई के दिल की तरह हमेशा खुला ही रहता है। हमने खुले-खुलाए दरवाज़े के पार ‘शुगर मिल‘ की तरफ़ से गन्ने की पर्ची लाने वाले हरकारे को देखा। पास जाकर उससे पर्ची ली तो उसने एक पम्फ़लैट भी हमारे हाथ में थमा दिया। जिसमें गन्ने की अच्छी नस्लों के बीज के बारे में जानकारी दे रखी थी और सबसे ऊपर मोटे मोटे हरफ़ों में लिखा हुआ था कि
‘मेरा सम्मान मेरे गन्ने से है‘
हम ताज्जुब में पड़ गए कि हमारे खेत में तो केला, लौकी और कद्दू भी होता है, बैंगन और खीरा भी होता है और जब हम इन्हें आढ़त में लेकर जाते हैं तो हरेक आढ़ती हमें सम्मान देता है और जब उससे रक़म लेकर वापस आते हैं तो जो भी मिलता है, वह भी हमें सम्मान देता है। इसके बावजूद आज तक किसी ने न कहा कि मेरा सम्मान मेरे खीरे-बैंगन से है या मेरा सम्मान मेरे केले से है।
हरकारा तो हमारे हाथ में पर्ची और पर्चा थमाकर चला गया और हम अपनी चैखट पर खड़े यही सोचते रहे कि आखि़र यह क्यों कहा गया कि ‘मेरा सम्मान मेरे गन्ने से है।‘
सोचते-सोचते अचानक हम पर राज़ खुला कि ऐसा क्यों कहा गया है ?
हक़ीक़त यह है कि हरेक बड़ा ब्लॉगर जानता है कि ‘उसका सम्मान उसके गन्ने से है।‘ (...जारी)

Monday, April 4, 2011

क्या बड़ा ब्लॉगर बनने के लिए नास्तिक होना ज़रूरी है ? A Nice Question

आपमें भी बड़ा ब्लॉगर बनने की उतनी ही संभावना मौजूद है जितनी कि उन ब्लॉगर्स में थी जो पहले छोटे थे और आज बड़े बन चुके हैं। अगर आप ग़ौर करेंगे तो आप पाएंगे कि उन्होंने कुछ नियमों का पालन किया है और उसी का नतीजा यह है कि आज वे बड़े ब्लॉगर कहलाते हैं।
आप देखेंगे कि एक बड़ा ब्लॉगर किसी न किसी आदर्श और सिद्धांत का पालन ज़रूर करता है। इन सिद्धांतों में से उनका एक सिद्धांत है बहुमत के साथ रहना। आज के बहुमत का विश्वास ईश्वर, धर्म और गुरूओं से डिगा हुआ है। ऐसी हालत में ये खुद को नास्तिक शो करते हैं या बन ही जाते हैं। आस्तिक ब्लॉगर को वर्चुअल दुनिया में बैकवर्ड समझा जाता है जबकि नास्तिक होना समय का रिवाज है। आस्तिक को सत्तर तरह के प्रश्नों के जवाब देने पड़ते हैं जबकि नास्तिक से कोई प्रश्न ही नहीं किया जा सकता क्योंकि वह जीवन की बुनियादी बातों को विचार करने लायक़ तक नहीं समझता। करोड़ों आस्तिकों के विचार नैतिकता और जायज़-नाजायज़ के बारे में एक हो सकते हैं लेकिन दो नास्तिकों के विचार भी इस मामले में एक नहीं हो सकते। इसके बावजूद नास्तिक समझते हैं कि अगर उनकी बात मान ली जाए तो देश का कल्याण हो सकता है। आज नास्तिकता भी एक विचारधारा के रूप में हमारे दरम्यान मौजूद है। नास्तिक ब्लॉगर शराब पीता है और फ़ेसबुक के प्रोफ़ाइल में बेधड़क खुद को ‘इंटरेस्टेड इन वुमेन‘ शो करता है। इनका यही सिद्धांत है और ये इसका कट्टरता से पालन करते हैं। कभी अपनी नास्तिकता से इंच भर नहीं हटते लेकिन आस्तिक ब्लॉगर्स पर इल्ज़ाम लगाते रहते हैं कि ये बहुत कट्टर हैं देखो ये अपनी मान्यताओं से नहीं हटते।
अगर आप एक नास्तिक ब्लॉगर हैं तो आपको बुद्धिजीवी का तमग़ा बड़ी आसानी से मिल जाएगा और नास्तिक ब्लॉगर आपको टिप्पणियां भी देने आने लगेंगे। जब बड़े आने लगेंगे तो जो खुद को ज़बर्दस्ती छोटा बनाए हुए हैं, वे भी उनकी देखा देखी आने लगेंगे और आपकी गाड़ी चल पड़ेगी। कोई ब्लॉगर आपके घर यह देखने नहीं आएगा कि जब आपने खुद विवाह किया था तो पूरे धार्मिक रीति-रिवाज के साथ किया था। आज भी आपकी पत्नी गले में मंगलसूत्र और सुहाग चिन्ह धारण करती है और जब आपने अपने बच्चों की शादी की, तब भी आपने पूरे धार्मिक कर्मकांड किए।
ऐसा आपने क्यों किया ? यह आपसे कोई कभी पूछने वाला नहीं है। धार्मिक रीति रिवाज भी करते रहिए ताकि समाज के ताने-उलाहने न सुनने पड़ें और फिर कह दीजिए कि भाई यह सब तो हमारी मिसेज़ की मेहरबानी है वर्ना हम तो इन सब चक्करों में पड़ते ही नहीं। इसे कहते हैं कि ‘रिन्द के रिन्द रहे और जन्नत हाथ से न गई‘।
क्या कह रहे हैं आप ?
रिन्द किसे कहते हैं ?
अरे भाई रिन्द कहते हैं शराबी को।
इसका मतलब है दोनों हाथों में लड्डू रखना।
बड़े ब्लॉगर की यह एक ख़ास हिकमत होती है।
अगर आप नास्तिक नहीं बन सकते तो फिर आपको अपनी आस्था टटोलनी चाहिए और अपना अमल देखना चाहिए। अगर आप नास्तिक नहीं हैं तो आपको अनिवार्य रूप से आस्तिक होना चाहिए। जब आप किसी शिक्षा और परंपरा में आस्था रखते होंगे तो लाज़िमन रूप से किसी न किसी को अपना गुरू भी मानते होंगे और उसकी शिक्षा के अनुसार कुछ बातों को ग़लत और कुछ को सही भी ज़रूर मानते होंगे। अब आपका पहला कर्तव्य यह है कि आपके कर्म आपके विचारों के मुताबिक़ हों या दोनों के दरम्यान अंतर बहुत ज़्यादा न हो। जिस बात को आप ग़लत मानते हों, उससे बचते भी हों और दूसरों को भी बचने की प्रेरणा देते हों और जिस बात को आप अच्छा मानते हों, उसे खुद भी करते हों और दूसरों को भी करने की प्रेरणा देते हों। आपके विचार और कर्म में अंतर जितना कम होगा आप उतने ही बड़े ब्लॉगर बन जाएंगे।
आप नास्तिक हों तो सच्चे हों और अगर आस्तिक हों तो भी आप सच्चे हों। सच में बड़ी ताक़त है। आप सच्चाई में जितना ज़्यादा बड़ा दर्जा रखेंगे, आपकी योग्यताओं का विकास भी उतना ही ज़्यादा होता चला जाएगा और एक दिन आपको आपकी सच्चाई परम सत्य तक भी पहुंचा देगी। जो पाखंडी हैं वे कहीं नहीं पहुंचेगे क्योंकि उनके फ़ैसलों का आधार सत्य नहीं होता बल्कि बहुमत होता है। पाखंडी कभी बहुमत के खि़लाफ़ नहीं जा सकता। बहुमत के खि़लाफ़ केवल वह बोलेगा जो सच्चा है। पाखंडी अवसरवादी होता है। वह कभी कुरबानी नहीं दे सकता।
आपके सामने दोनों रास्ते हैं। आप पाखंडी बनकर भी बहुजन से टिप्पणियां और प्रशंसा पा सकते हैं और यही सब आपको सच्चा बनकर भी मिल सकता है और न भी मिले तब भी आप अपनी आत्मा में संतुष्ट रहेंगे कि मैं वही लिखता हूं जो कि मैं सोचता हूं। ‘डायरी लेखन‘ इसी का नाम है। इसी को ब्लॉग लेखन भी कहा जाता है।
आज लोग जो सोचते हैं, उसी के खि़लाफ़ करते हैं और लोगों को खुश रखने के लिए उसी के खि़लाफ़ लिखते और बोलते हैं। अगर आप विचार और कर्म के इस अंतर को पाट सके तो यह एक बड़ा काम होगा और आपका बड़ा काम ही इस बात का सुबूत खुद होगा कि