Saturday, April 23, 2011

कैसा होता है एक बड़े ब्लॉगर का वैवाहिक जीवन ? Family Life


हमने अपनी शरीके-हयात को बताया-‘ख़ानम ! महीने की आखि़री तारीख़ को हिंदी ब्लॉगर्स का एक सम्मेलन हो रहा है।‘
‘तो‘-उन्होंने अपनी रसोई से ही दरयाफ़्त दिया।
अब हमें अपनी स्टडी से निकलकर उनकी रियासत के मरकज़ में यानि कि किचन में जाना पड़ा।
‘भई, तो से क्या मतलब ?, सम्मेलन हो रहा है ब्लॉगर्स का।‘-हमने जैसे ही कहा तो उन्होंने अपने हाथ के मसाले मिक्सी में डालकर मिक्सी फ़ुल स्पीड पर ऐसी चलाई कि तमाम टमाटर लहू-लुहान होकर रह गए। हमने शुक्र मनाया कि हम टमाटर की योनि में नहीं जन्मे वर्ना आज पीसकर रख दिए गए होते। तमाम मर्दों की तरह हम भी अपने दिल ही दिल में अपनी ख़ानम से डरे हुए से रहते हैं लेकिन बाहर से उन पर दूसरों की तरह हम भी कभी अपने दिल की हक़ीक़त ज़ाहिर नहीं होने देते। आज मर्दों के पास बस एक यह भ्रम ही तो बचा हुआ है मर्दानगी का कि हम तोप हैं वर्ना तो आज कौन सा काम ऐसा है जिसे औरत नहीं कर रही है या कर नहीं सकती और वह भी मर्द से बेहतर। यहां तक कि हिंदी ब्लॉगिंग भी औरतें ही कर रही हैं मर्दों से बेहतर। मर्द क्या कर रहा है ?
औरत की आबरू तार-तार कर रहा है, उसे नंगा कर रहा है।
छिनाल छिपकली डॉट कॉम वाले भाई विशाल ‘वनस्पति‘ जी के नाम से तो ऐसा लगता है मानों वे पुरातन भारतीय संस्कृति के कोई बहुत बड़े प्रहरी हों लेकिन जब हमने उनकी ‘छिनाल छिपकली‘ वाली पोस्ट देखी तो हम शर्म के मारे भाग आए वहां से बिना टिप्पणी किए ही। भाई विशाल ने वहां एक औरत की बिल्कुल नंगी फ़ोटो लगा रखी थी जो कि उन्होंने अपनी पत्नी या बहन की तो बिल्कुल भी नहीं लगाई होगी। जब वे अपनी पत्नी और बहन की मादरज़ाद नंगी फ़ोटो नहीं लगा सकते तो फिर उन्होंने किसी और की बीवी और बहन की फ़ोटो ही क्यों लगाई अपनी पोस्ट पर ?
हया-ग़ैरत का कुछ पता नहीं और दावा यह है कि ‘अभिव्यक्ति की नई क्रांति‘ पर होल्ड हमारा होना चाहिए।
उनसे भी ज़्यादा बेग़ैरत वे औरतें हैं जो उस पोस्ट पर विराजी हुई वाह-वाह कर रही हैं। बाद में एक बूढ़ी तजर्बेकारा ने उनके कान खींचे तो उन्होंने किसी की बहन की वह नंगी फ़ोटो वहां से हटाई। इसीलिए कहते हैं कि पुराना चावल पुराना ही होता है।
ख़ैर, टमाटर पर अपना गुस्सा निकालने के बाद हमारी ख़ानम चावल धोने लगीं और जब वे पानी के संपर्क में आईं तो उनका टेम्प्रेचर कुछ कम हुआ। हमने फिर कहा-‘हमें हिंदी ब्लॉगर्स के इस भव्य सम्मेलन में बुलाया जा रहा है विद फ़ैमिली। सो आप चिंटू-पिंटू, नन्हीं और मुन्नी को तैयार कर देना और खुद भी तैयार रहना।‘
उन्होंने पूछा-’क्या मतलब ?‘
‘अरे भई, क्या हर बात खोलकर ही कहनी पड़ेगी ? आप एक गृहस्थन हैं, थोड़ा समझा कीजिए। दावत वाले दिन बच्चों को सुबह नाश्ता मत दीजिएगा, बस चाय पिला दीजिएगा और दोपहर को हल्का फुल्का सा ही दीजिएगा ताकि रात को हमारे मेज़बान को कोई शिकायत न हो कि उनका खाना बचकर बेकार गया।‘-हमने अपनी हिकमत बयान की तो वे भड़क पडीं-‘आपने इतनी बेहूदा बात सोची भी कैसे ?, क्या हम मुफ़्तख़ोर हैं ?‘
‘अरे भई, हमने नहीं सोची बल्कि यह ब्लॉगर सम्मेलन का आम रिवाज है, वहां सभी ऐसे ही तैयारी से आते हैं।‘-हमने बताया।
‘आपकी ख़ानदानी शराफ़त और ग़ैरत को दिन-ब-दिन आखि़र होता क्या जा रहा है ?‘-उन्होंने अपनी हैरत का इज़्हार किया।
‘क्यों क्या हुआ हमारी शराफ़त को ?‘-अब हम सचमुच ही भन्ना गए थे।
‘जबसे ब्लॉगिंग शुरू की है तब से आपकी कोई चूड़ी टूटी हमसे ?‘-हमने भी अपनी शराफ़त का सुबूत पेश कर दिया।
‘हमने चूड़ियां ही पहननी छोड़ दीं जबसे आपने यह निगोड़ी ब्लॉगिंग शुरू की है। इसने तो सुहागन और बेवा का ही फ़र्क़ मिटाकर रख दिया है। जब कोई देखने वाला ही नहीं तो क्या करें हम बन-संवर कर ?‘-उनके तो आंसू निकल पड़े। आप रोने वाले से नहीं लड़ सकते। औरत की सारी ताक़त उसकी आंखों में है। यहां शोला भी है और शबनम भी। उन्हें रोते हुए अगर हमारे बच्चों ने देख लिया तो बच्चे भी हमसे नफ़रत करने लगेंगे, सोचेंगे कि ज़रूर हमारी अम्मी जान को मारा होगा। हम उनकी मिन्नत समाजत करने लगे और अब जो हमने उनके चेहरे को ग़ौर से देखा तो वाक़ई दुख सा हुआ। उनका चेहरा विधवा का सा ही लग रहा था। तभी हमें ख़याल आया कि अगर सरकार देश की जनसंख्या पर सचमुच क़ाबू पाना चाहती है तो उसे ब्लॉगिंग को बढ़ावा देना चाहिए। क्या मजाल अगर कोई शौहर अपनी बीवी के पास फटक भी जाए।
‘देखिए, आप हमारी शराफ़त पर सवाल उठा रही थीं लेकिन क्या यह आपकी शराफ़त की बात है कि दिन में ही रो रही हैं ? क्या आप हमारे बच्चों को हमसे बदगुमान करना चाहती हैं ?‘-उन्हें चुप करने का हथकंडा हमें पता था और सचमुच वह चुप हो भी गईं। औरतों को अपनी परेशानी का इतना ख़याल नहीं होता जितना ख़याल वे अपने नालायक़ से शौहरों की इज़्ज़त का रखती हैं।
‘शरीफ़ हूं तभी आपके घर में दिन काट रही हूं और आपके बच्चे पाल रही हूं। ख़ैर आप बताएं कि आपका मसअला अस्ल में है क्या ?‘-अब वह बात करने के मूड में आ गई थीं।
‘भई, खाने की दावत है, बुलावा आया है, मुख़तसर कहानी तो यह है।‘-हमने शॉर्टकट मारना ही मुनासिब समझा।
‘आपके पास कोई कॉल आई है क्या ?‘-उन्होंने पूछा।
‘नहीं तो, सपना समूह वालों की तरफ़ से हमें एक दावतनामा मिला है ईमेल के ज़रिये।‘-हमने कहा।
‘बस ?‘-उन्होंने बस पर बहुत ज़्यादा ज़ोर दिया तो हम खटक गए।
‘तो क्या किसी कबूतर को संदेसा लाना चाहिए था?‘-हम झुंझला से गए।
‘क्या उन लोगों के पास आपका मोबाइल नंबर नहीं है ?‘-उन्होंने पूछा।
‘है क्यों नहीं, बिल्कुल है। अभी तो हमने विशाल ‘वनस्पति‘ जी को खुद दिया था चैट पर‘-हमने कहा।
‘इसके बावजूद भी उन्होंने आपको कॉल नहीं की। इसका मतलब समझे आप ?‘-उन्होंने हमसे पूछा।
‘नहीं तो।‘-हमें अपनी अक्ल पर रोने को जी चाह रहा था।
‘वे चाहते ही नहीं हैं कि आप उनके प्रोग्राम में आएं। अगर वे आपको दिल से बुलाने के ख्वाहिशमंद होते तो वे आपको कॉल ज़रूर करते।‘-उनकी बात में दम था।
‘अगर उन्हें हमें बुलाना ही नहीं है तो फिर उन्होंने हमें इन्विटेशन कार्ड क्यों भेजा ?‘-हमने मासूमियत से पूछा।
‘ताकि वे आपको अपनी शान दिखा सकें कि देखो हम कित्ता बड़ा प्रोग्राम कर रहे हैं। आपमें दम है तो आप इससे बड़ा प्रोग्राम करके दिखाएं।‘-उन्होंने कहा और हमारे दिल को भी लगा।
‘जब आप हमें ब्याहने आए थे तो जिन लोगों को आप अपने निकाह में मौजूद देखना चाहते थे, उन्हें आपने कार्ड भी भेजा, कॉल भी किया और उन्हें कार भी करके दी ताकि वे आने से रह न जाएं।‘
‘हां, यह तो है।‘-हमने कहा।
‘इस प्रोग्राम में भी मुन्तज़िमीन जिन्हें बुलाना चाहते हैं उन्हें कार्ड के साथ कॉल भी ज़रूर की होगी और उनके लिए कन्वेंस का इंतज़ाम भी किया होगा।‘-उन्होंने केस पूरी तरह सॉल्व कर दिया था।
‘इसका मतलब तो यह है कि इस प्रोग्राम में सिर्फ़ ईनाम ही नहीं बल्कि मेहमान भी फ़िक्स हैं। घोटाला दर घोटाला‘-हम कुछ सोचते हुए से बुदबुदाए।
‘और नहीं तो क्या ?‘-अपनी दानिश्वरी साबित होते देखकर अब उनके होंठों पर मुस्कुराहट तैरने लगी थी।
‘तो निमंत्रण भेजने का मक़सद आजकल बुलाना नहीं होता बल्कि अपनी शेख़ी बघारना होता है।‘
‘जी हां।‘-उन्होंने बड़े फ़ख्र से कहा। अपने हाथ से एक उम्दा सी दावत निकलते देखकर हमारा दिल बहुत फड़फड़ा रहा था।
‘लेकिन कुछ ब्लॉगर्स तो मात्र इन्वीटेशन कार्ड पाकर ही पहुंच जाएंगे सम्मेलन में।‘-हमने अपना अंदेशा ज़ाहिर किया।
‘सिर्फ़ वे ब्लॉगर्स जाएंगे जिनके बीवी नहीं होगी या होगी तो उससे वे पूछेंगे नहीं।‘-उन्होंने कहा।
‘वे वहां क्यों जाएंगे ?‘
‘जिस मक़सद से वहां लड़कियां आएंगी। जानते हो आजकल रिश्ते मिलना कितना मुश्किल हो रहा है ?‘-उन्होंने एक और क्ल्यू दिया।
‘तो जो लोग आएंगे, उन्हें भी ‘हिंदी ब्लॉगिंग का आगा-पीछा‘ जानने में कोई दिलचस्पी न होगी।‘-हमारी हैरत बढ़ती ही जा रही थी।
‘हर आदमी आज तरह-तरह के मसाएल से घिरा हुआ है, उसे सिर्फ़ अपने मसाएल का हल चाहिए। वह जहां भी जाता है अपने मसाएल के हल के लिए जाता है या फिर ...।‘-उन्होंने मुस्कुराकर बात अधूरी छोड़ दी। उनका विधवापन हल्के-हल्के दूर होता जा रहा था। लग रहा था कि आज ज़रूर कुछ होकर रहेगा, बहुत दिनों बाद।
‘या फिर...।‘-लेकिन हम भी हातिम ताई की तरह पहले सवाल हल कर लेना चाहते थे।
‘या फिर अपने मसाएल से फ़रार इख्तियार करने के लिए, थोड़ा सा दिल बहलाने के लिए।‘
‘हां, शायद इसीलिए वहां नाच-गाने और नाटक वग़ैरह का प्रोग्राम भी रखा गया है। इसका मतलब आयोजक भी जानते हैं कि हमारी किताब और हमारी परिचर्चा से लोगों को बोरियत होगी ?‘-हमें हैरत का एक और झटका लगा।
‘लेकिन लोग बोर होंगे नहीं।‘-उन्होंने फिर एक और चोट कर डाली।
‘क्यों भला ?‘
‘कुछ अपनी अक्ल पर भी तो ज़ोर डालिए न। बस बहुत हो गई बातें। हमें खाना तैयार करने दीजिए। बच्चे अब स्कूल से आते ही होंगे। आप खुद तो किसी काम के अब बचे नहीं हैं। हमें तो अपने बच्चे देखने दीजिए।
हम समझ रहे थे कि वह क्या कह रही हैं और क्या चाह रही हैं लेकिन हम सचमुच ही कुछ कर पाने की हालत में नहीं रह गए थे। यह ब्लॉगिंग अंदर तक से खोखला कर देती है। ग़ैरत के साथ-साथ यह ताक़त को भी चाट जाती है।
‘अंदर से खोखले लोगों का सम्मेलन बाहर से कितना भव्य लगेगा ?‘-हम मन ही मन में सोच रहे थे। काश हमें उन दोनों में से कोई फ़ोन ही कर लेता तो कम से कम अपने परिजनों को साथ ले जाने का हमारा मुंह तो हो जाता।  (...जारी)

17 comments:

खुशदीप सहगल said...

अनवर भाई,
आप बेहतरीन लिखते हैं, इसका सबूत है ये पोस्ट...लेकिन बीच में बस एक पैराग्राफ छिपकली-छिनाल से जो संबंधित है, वो इस पूरी पोस्ट में स्वादिष्ट खाने में कंकड़ की तरह लग रहा है...ऐसे कंकड़ अपने लेखन से दूर रखिए और बस इसी तरह से लिखिए जैसे आज बाकी लिखा है...ऐसा करने से आप मुख्यधारा से ही नहीं जुड़ेंगे बल्कि फिर मुख्यधारा ही आपके पीछे दौड़ेगी...दूसरों को हंसाने से ज़्यादा बड़ी नेमत का काम और कोई नहीं है...वरना रूलाने को को ज़िंदगी की कड़वी हक़ीक़तें तो पहले से ही बहुत हैं....बाक़ी मेरी पोस्ट पर आकर डॉ अमर कुमार जी के सवाल का ऐसा जवाब दीजिए जो सबको खिलखिला दे...

शुभकामनाएं...

जय हिंद...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बढ़िया और स्तरीय व्यंग्य लेखन के लिए बहुत-बहुत बधाई!
पढ़कर आनन्द आ गया!

DR. ANWER JAMAL said...

@ आदरणीय भाई खुशदीप सहगल जी ! मैंने आपकी नसीहत को ग़ौर से दो बार पढ़ा, आधे घंटे के अंतराल से। आपने मुझे नसीहत की है जिससे मेरे प्रति आपकी फ़िक्रमंदी का पता चलता है लेकिन आपकी नसीहत पर अमल करने से पहले मुझे अपनी पूरी स्ट्रैटेजी पर ग़ौर करना होगा और आपको भी यह जानना ज़रूरी है कि यह सब आखि़र हो क्यों रहा है ?
हालांकि इसे बयान करने के लिए एक पूरी पोस्ट दरकार है लेकिन संक्षेप में अर्ज़ करता हूं कि ‘मैं न कोई संत हूं और न ही कोई जोकर।‘
संत का काम क्षमा करना होता है और जोकर का हंसाना। मैं जज़्बात से भरा हुआ एक आम आदमी हूं, एक पठान आदमी। पठान का मिज़ाज क़बायली होता है, वह आत्मघाती होता है। वह हर चीज़ भूल सकता है लेकिन वह इंतक़ाम लेना नहीं भूलता। मैं आर्यन ब्लड हूं। इस्लाम को पसंद करने के बावजूद मैं अभी भी इस्लाम के सांचे में पूरी तरह ढल नहीं पाया हूं। अभी मैं अंडर प्रॉसैस हूं। इसी हाल में मैं हिंदी ब्लॉगर बन गया। मेरे दीन का और खुद मेरा तिरस्कार किया गया। एक लंबे अर्से तक सुनामी ब्लॉगर्स मेरी छवि को दाग़दार करते रहे और बाक़ी ब्लॉगर्स मुझे दाग़दार करने वालों की चिलम भरते रहे। ये वही लोग हैं जिन्हें नेकी और नैतिकता का ख़ाक पता नहीं है। जो कुछ मुझे दिया गया है, मैं उसके अलावा उन्हें और क्या लौटा सकता हूं ?
इसीलिए आपको मेरे लेख में आक्रोश मिलेगा, प्रतिशोध मिलेगा, अपमान और तिरस्कार भी मिलेगा, कर्कश स्वर और दुर्वचन भी मिलेगा, टकराव और संघर्ष मिलेगा। आपको मेरे लेख में बहुत कुछ मिलेगा लेकिन असत्य नहीं मिलेगा। ‘छिनाल छिपकली प्रकरण‘ भी ऐसी ही एक घटना है जो कि एक वास्तविक घटना है। औरत को सरेआम नंगा किया गया लेकिन कोई मर्द नहीं आया इसकी निंदा करने। द्रौपदी की साड़ी ज़रा सी खींचने पर तो दुःशासन आज तक बदनाम है और जिन्होंने औरत को पूरा नंगा कर दिया, उसे अपमानित ही कर डाला वे नेकनाम कैसे बने घूम रहे हैं ‘सम्मान बांटने का पाखंड‘ रचाते हुए ?
इस प्रकरण को लेख से निकालने का मतलब है अपने लेख के मुख्य संदेश को निकाल देना, फिर इसमें बचेगा ही क्या ?
इसी संदेश को रूचिकर बनाने के लिए अन्य मसाले भरे गए हैं। जिसे आप एक कंकर की तरह अप्रिय समझ रहे हैं, वास्तव में वही मुद्दे की बात है। हां, अगर वह झूठ हो तो मैं उसे निकाल दूंगा , झूठ से मेरा कोई संबंध नहीं है। अपने विरोधी के खि़लाफ़ भी मैं झूठ नहीं बोलूंगा।
मेरा बहिष्कार करके मेरे विरोधियों ने और उनके सपोर्टर्स ने मेरा क्या बिगाड़ा ?
किसी से कोई रिश्ता बनने ही नहीं दिया कि किसी से कोई मोह होता, किसी के दिल दुखने की परवाह होती। जब किसी को हमारी परवाह नहीं है तो फिर भुगतो अपने कर्मों को। मत आओ हमारे ब्लॉग पर, मत दो हमें टिप्पणियां और फिर भुगतो फिर उसका अंजाम। ऐसा मैं सोचता हूं और जो मैं सोचता हूं वही अपने ब्लॉग पर लिखता हूं।
क्या ब्लॉग पर सच्चाई लिखना मना है ?
इसके बावजूद मेरे दिल में कुछ लोगों के प्यार भी है और सम्मान भी। प्रिय प्रवीण जी के साथ आप और डा. अमर कुमार जी ऐसे ही लोग हैं। डा. अमर कुमार जी के ज्ञान में वृद्धि की कोशिश करना सूरज को दिया दिखाना है और आपको मैं अपना मानता हूं।
आपकी सलाह प्रैक्टिकल दुनिया में जीने का बेहतरीन उपदेश है। मैं इस सलाह की क़द्र करता हूं। महानगरीय जीवन में यह उसूल लोगों की ज़िंदगी में आम है लेकिन मैं एक क़स्बाई सोच वाला आदमी हूं, मेरा माहौल भी आपसे थोड़ा अलग है। इसलिए हो सकता है कि आपकी सलाह पर अमल करने में मुझे कुछ समय लग जाए।
एक नेक सलाह के लिए मैं आपका दिल से आभारी हूं।
शुक्रिया !

खुशदीप सहगल said...

अनवर जमाल भाई,
आपने मेरी बात पर गौर किया, यही मेरे लिए बहुत है...ऐसे ही गौर करते रहे तो मेरा विश्वास है, एक दिन सूरत
ज़रूर बदलेगी...

हां आंख के बदले आंख के निजाम पर चला जाए तो एक दिन पूरी दुनिया अंधों की बस्ती बन जाएगी...
जान के बदले जान की इंतकामी रवायत, एक दिन दुनिया से आदमियों का नामों निशान ही मिटा देगी...

और हां, जोकर के अंदर की ट्रेजिडी देखनी हो तो किसी दिन राज कपूर साहब की फिल्म मेरा नाम जोकर गौर से ज़रूर देख लीजिएगा...पहले देख रखी है तो एक बार फिर देख लेने में भी कोई हर्ज़ नहीं होगा...

जय हिंद...

डा. श्याम गुप्त said...

"दूसरों को हंसाने से ज़्यादा बड़ी नेमत का काम और कोई नहीं है.." ---सही जवाब दिया है अनवर जी ने ---हंसाना काम जोकर का है और वह कोई नेमत नहीं...मुद्दों से भटकाना है...

Bhushan said...

सुंदर शैली में लिखा गया व्यंग्य. बहुत खूब.

DR. ANWER JAMAL said...

भाई खुशदीप जी ! आपने अपनी पोस्ट में हमारा नाम लिया, हमें नेक नसीहत से नवाज़ा। आपने हमें इज़्ज़त बख्शी है। हम आपके शुक्रगुज़ार हैं। बतौर शुक्रिया हम आपको दो प्यारी सी ग़ज़लें हदिया करते हैं। प्लीज़ तशरीफ़ लाइये और कुबूल कीजिए। इस मौक़े पर तमाम टिप्पणीकार और ग़ैर-टिप्पणीकार पाठक भी आमंत्रित हैं।
शुक्रिया !

वक्त से पहले चराग़ों को जलाते क्यों हो
ऐसी तस्वीर ज़माने को दिखाते क्यों हो

मुझसे मिलने के लिए आते हो आओ लेकिन
मुझको भूले हुए दिन याद दिलाते क्यों हो

ले के उड़ जाएंगी इस को भी हवाएं अबके
अपनी तस्वीर से दीवार सजाते क्यों हो

तुमको यह दुनिया उदासी के सिवा क्या देगी
बेवफ़ा दुनिया से दिल लगाते क्यों हो

भूल बैठे हो क्या पुरखों का आदर्श
अपने ही भाई का तुम खून बहाते क्यों हो

और एक और ग़ज़ल आपके लिए

है बेगुनाह दार पर अदालतों की बात कर

वाणी गीत said...

शानदार व्यंग्य ,
मैं खुशदीप जी से सहमत हूँ की यदि व्यक्ति /पोस्ट विशेष को आधार ना बनाते हुए लिखा जाता तो इसकी रोचकता और उपयोगिता बढती !

Neelam said...

Anwer ji maza a gaya padh kar..:)
Anwer ji ab to main bhi yahi soch rahi hoon ki agar mujhe bhi bloggers ki meet main bulana hota to koi achhe se invite karta..call karta, dekhiye naa hume to mail tak nahi aayi..:((( aur fir bhi jaan lada rahe hain ki delhi jaya jaaye..aap sbse mulaqat ka mouka milega....
WAISE YE BLOGGERS KI MEETING KA KARTA DHARTA HAI KOUN....:p Hum to ye bhi nahi jaante...:D

Akshita (Pakhi) said...

अच्छा लिखा आपने...बधाई.
________________________
'पाखी की दुनिया' में 'पाखी बनी क्लास-मानीटर' !!

अमि'अज़ीम' said...

Daasu...

अरुण चन्द्र रॉय said...

"छिनाल छिपकली डॉट कॉम"... ye kya prakaran hai... baki post to badhiya hai.. shandaar hai..

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

श्रीमान जी, आपने व्यंग शैली में ढोंगी(सच लिखने का दम भरने वालों पर) करारा प्रहार किया है. और आदरणीय भाई खुशदीप सहगल जी को सम्बोधित टिप्पणी में व्यक्त आपके विचारों से सहमत भी हूँ. श्रीमान जी, समाज में कुछ ऐसे लोग भी है न खुद सच लिख सकते हैं और न किसी दूसरे को लिखते हुए देख सकते हैं या यह कहे उनको दस्त लग जाते हैं. आपकी पोस्ट बहुत अच्छी होती हैं मगर मुझे कई शब्द आपके उर्दू के शब्दों अर्थ मालूम न होने के कारण समझ नहीं आते हैं. वैसे उर्दू भाषा में बहुत आदर-सम्मान का बहुत भाव है. क्या आप मात्र मुझ एक अनाड़ी के लिए उर्दू के शब्दों के साथ उनका अर्थ हिंदी में भी दे सकते हैं? जैसे-खुलूस(साफ़ ह्रदय) खुलूस से परखिये खुलूस के लिए हम तो जान भी देंगे दोस्ती के लिए.

DR. ANWER JAMAL said...

आदरणीय रमेश जैन जी ! आपकी बातों से आपके पांडित्य और नेकनीयती का पता चलता है। इसके बावजूद भी आपने अपना तख़ल्लुस ‘सिरफिरा‘ शायद इस लिए रख लिया होगा कि आजकल दुनिया सच बोलने वालों को सरफिरा ही कहती है। आपकी टिप्पणी से मुझे हौसला मिला और लगा कि मैं दीवारों से ही अपना सिर नहीं टकरा रहा हूं बल्कि मेरी तरह यहां और भी सिरफिरे और दिलजले मौजूद हैं।
उर्दू और हिंदी दोनों ही भाषाएं मेरी मादरी जुबानें हैं अर्थात मातृ भाषाएं हैं। दोनों में ही आदर-सम्मान के शब्द भी हैं और भावनाएं भी। आपको उर्दू में आदर-सम्मान का भाव बहुत लगता है तो यह आपकी साफ़ दिली और आपके खुलूस की बात है। खुलूस ‘ख़ालिस प्रेम‘ को कहते हैं जिसमें बदले में कुछ पाने का लालच न हो। आपको उर्दू शब्दों में से जिसका अर्थ पूछना हो, मुझसे बेहिचक पूछ लिया करें। अगर मुझे पता हुआ तो मैं आपको ज़रूर ही बता दूंगा। अगर मुझे समय मिला तो मैं आपको मात्र 10 दिनों में पूरी उर्दू ही लिखना-पढ़ना सिखा दूंगा। अब आप हमारे हो चुके हैं तो जान लीजिए कि हम भी आपके हो गए।
मैं जिन लोगों का विरोध करता हूं, उनके मामले में भी मैं चाहूं तो चुप रह सकता हूं और इसके बदले में वे मुझे भी गले लगा लेंगे लेकिन मुझे उनके गले लगकर करना क्या है अगर वे औरत को सम्मान देना सीखने के लिए ही तैयार नहीं हैं ?
अगर मैं भी चुप हो जाऊं तो फिर इनके खि़लाफ़ बोलने वाला तो यहां कोई है ही नहीं। औरत को नंगा करने वालों को और उनके सपोर्टर्स को मैं हिंदी ब्लॉगिंग का मार्गदर्शक स्वीकार नहीं कर सकता। इनकी शराफ़त का नक़ाब तो खींच ही लूंगा, इंशा अल्लाह।
क्योंकि हमारे प्रयास सार्थक और सफल हों, यह भी उस मालिक की कृपा पर ही निर्भर है।
Please see
http://blogkikhabren.blogspot.com/2011/04/blog-fixing_25.html

DR. ANWER JAMAL said...

@ नीलम जी ! दिल्ली में तो आपका मायका है। आप तो एक पंथ दो काज कर लेना चाहती हैं। इसीलिए तो मैं कहता हूं कि औरतों का दिमाग़ चाचा चैधरी के दिमाग़ से भी तेज़ चलता है।

@ अरूण जी ! बात तब की है जब चिठ्ठाजगत नाम का एक एग्रीगेटर हुआ करता था। तब एक नामी ब्लॉगर ने एक बहुचर्चि पोस्ट बनाई थी और दुनिया को छिपकलियों के सतीत्व के बारे में ख़बर दी थी कि ‘छिपकलियां छिनाल नहीं होतीं।‘ इतना बताते बताते पता नहीं वह कैसे बहक गए ?
चलिए एक आदमी बहक जाए तो बहक जाए लेकिन जब आप उनकी पोस्ट पर जाएंगे तो उनकी पूरी मंडली ही वहां ‘वाह वाह अति सुंदर‘ कहती हुई नज़र आएगी। इस मंडली के ज़्यादातर सदस्यों को सम्मानित किया जाएगा।
जिन लोगों को सही-ग़लत का पता नहीं, किसी नैतिकता के वे पाबंद नहीं , ग़लत को ग़लत कहने का हौसला उनमें नहीं, ऐसे गुटबाज़ों को सम्मानित करके हिंदी ब्लॉगिंग का बेड़ा आखि़र क्यों ग़र्क़ किया जा रहा है ?
इस पोस्ट का मूल विषय यह है जिसे हास-परिहास और व्यंग्य के माध्यम से कहने की कोशिश की गई है।
हिंदी ब्लॉगिंग की बेहतरी के लिए हरेक आदमी को मुखर होना ही होगा।

anitakumar said...

बेहतरीन व्यंग, बेहतरीन भाषा। पढ़ना अच्छा लगा।

एस.एम.मासूम said...

अनवर जमाल का कमाल. शांति से लिखे तो बड़ा ब्लॉगर