Saturday, April 20, 2013

विदेश में ईनाम क्यों बांटता है बड़ा ब्लॉगर ?Nepal



‘सरदार, आपके नॉर्थ एशिया में छपे इंटरव्यू पर ब्लॉगर्स बड़ा ताव खा रहे  हैं‘-जंगलायतन वाले ने आकर सांभा स्टाइल में अपने बॉस को ख़बर दी। 
‘सरदार तो तू ऐसे कह रहा है जैसे कि मैं गब्बर सिंह होऊँ।‘-उसके बॉस ने ‘भोजपुरी ब्लॉगिंग के इतिहास‘ के पन्ने पलटते हुए कहा।
‘ हें हें हें, आप उनसे कम भी तो नहीं हैं।‘-जंगलायतन के उजड्ड ने अपनी बात ऊपर रखते हुए कहा।
‘कैसे ?‘
‘वह भी लूटता था और आप भी लूट लेते हैं।‘-यह कहकर उसने अपने हाथ जोड़ दिए और हस्बे आदत ‘हें हें हें‘ करने लगा।
बॉस को उसकी बात और अदा दोनों ही भा गईं। कोई ब्लॉगर बॉस को कुछ कह देता था तो यही जाकर उसे अपना गंवारपना दिखाया करता था। यह सारी बात एक ऑफ़िस में चल रही थी। दोनों ही भोजपुरी ब्लॉगर थे। एक बड़ा था और दूसरा छोटा। तीसरा अभी आया नहीं था। जब से उसका ब्लॉग किसी जापानी कंपनी ने ईनाम के लिए छांट लिया था। तब से वह शहर के हरेक सायबर कैफ़े से अपने ब्लॉग को ख़ुद ही वोट कर रहा था और दोस्तों को भी इसी हिल्ले में लगा रखा था। वह जानीश था। उसने अपनी बीवी को भी अपने समर्थन में पोस्ट लिखने पर लगा रखा था। उसे उम्मीद थी कि शायद महिला ब्लॉगर झांसे में आ जाएं।
बॉस अब भी किताब को पलटे जा रहा था।
‘सरदार, इस किताब में क्या रखा है सिवाय लुटने वालों के नाम पतों के अलावा ?‘-जंगलायतन के स्वामी ने पूछा।
‘सब कहां लुट पाए, कुछ तो बचकर साफ़ निकल गए और कुछ वादा करके मुकर गए।‘-बॉस ने हसरत से कहा।
‘...तो फिर आप देख क्या रहे हैं इसमें ?‘-छोटे ब्लॉगर ने बिना सिर खुजाए पूछा।
‘कुछ नाम, ईनाम के लिए ?‘-बॉस ने बताया।
‘ईनाम का यह कौन सा मौसम है ?‘-उसने हैरान होते हुए कहा।
‘ईनाम के लिए मौसम-बेमौसम क्या ? ईनाम के मारों को जब भी ईनाम दो तभी ले लेते हैं।‘
‘...लेकिन अचानक ईनाम देने की ज़रूरत क्या आन पड़ी आक़ा ?‘-
‘ज़रूरत नहीं मजबूरी है। जापानी कंपनी ‘वायचे डेले‘ को पता चल गया है कि इधर पुरस्कारों की बड़ी डिमांड है। उसने भी हमारे ग्राहकों को लुभाना शुरू कर दिया है। एक तो इंटरनेशनल पुरस्कार और ऊपर से मुफ़्त में। अपना बिज़नेस हाथ से जा सकता है।‘-बॉस ने दुख का कड़वा सा घूंट पीते हुए कहा।
‘यह भी मुफ़्त में नहीं मिल रहा है। अपने जानीश ने एंकर को बहुत आदाब और तस्लीम किए हैं। तब जाकर उसके कुछ ब्लॉगों को उसने चुना है। आगे से इसमें पैसा और सिफ़ारिश भी चलेगी। जापान का यह पुरस्कार भी अपने भाई बेच डालेंगे।‘-छोटे ब्लॉगर ने तसल्ली दी।
‘पुरस्कार बिकते ही हैं। यह सब जानते हैं। उनकी सेल ही हमारी चिन्ता का विषय है। हमारे इलाक़े में दूसरे का पुरस्कार नहीं बिकना चाहिए या कम से कम हमारे पुरस्कारों की सेल बंद नहीं होनी चाहिए। इसी से हमारा दाल-भात चलता है। इसीलिए हमें प्रीमेच्योर ईनाम देना पड़ रहा है।‘-बॉस ने कहा।
‘इस बार ईनाम कहां देंगे ?‘
‘नेपाल में।‘
‘नेपाल ठीक नहीं रहेगा। वह बदनाम है।‘
‘तू वहां कब गया था ?‘
‘मैं नहीं गया तो क्या देवानंद तो गए थे। उन्हें वहां अपनी बहन चरस गांजा पीते हुए मिली थी। आपने देखा नहीं हरे रामा हरे कृष्णा में ?‘
‘यह फ़िल्मी बातें हैं।‘
‘जगन्नाथ रसोईया भी स्वामी दयानन्द को ज़हर देकर वहीं भागा था।‘-जंगलायतन वाले ने अपना ज्ञान बघारा।
‘यह किताबी बात है।‘
‘वहां समलैंगिकों की परेड भी निकल चुकी है और वहां राज परिवार को भी उनके किसी अपने ने ही ठिकाने लगा दिया था। यह तो हक़ीक़त है न।‘
‘ये पुरानी बातें हैं और न ही हम राजमहलं जाएंगे।‘-बॉस ने कहा।

‘वहां कोई घुसने भी नहीं देगा और किसी तरह घुस गए तो बाहर नहीं आने देगा। वहां कई लॉबियां काम कर रही हैं बॉस। सबकी ढपली तो एक ही है लेकिन राग अलग अलग है।‘
‘ढपली एक क्यों है ?‘-बॉस ने मुस्कुराते हुए पूछा।
‘ग़रीबी के कारण।‘-छोटा ब्लॉगर बोला।
‘अच्छा है।‘
‘क्या कहा, ग़रीब होना अच्छा है।‘-उजड्ड ब्लॉगर चकरा गया।
‘हां, वहां ग़रीबी है। इसीलिए वहां दिल्ली या लखनऊ के मुक़ाबले कार्यक्रम के लिए जगह सस्ते में ही मिल जाती है। लेबर भी सस्ती है।‘-प्रगतिशील लेखक के रूप में प्रसिद्ध बॉस ने किसी पूंजीपति की भांति कहा।
‘...लेकिन बॉस वहां भारत का विरोध करने वाले तत्व भी हैं। कहीं उन्हें हमारा पता चल गया और उन्होंने कोई चीनी बम हमारे सम्मेलन पर फेंक मारा तो ...?‘-छोटे ब्लॉगर ने पते की बात कही। उसके चेहरे पर हवाईयां उड़ रही थीं।
‘...तो क्या ?, दो चार ब्लॉगर मर गए तो अपना नाम दुनिया में हो जाएगा। स्टेज की कुर्सियों को हम चेक करके बैठेंगे। बाक़ी की कुर्सियों को चेक करना ब्लॉगर्स की ज़िम्मेदारी है।‘-बॉस ने समस्या का समाधान कर दिया।
‘भोजपुरी ब्लॉगर्स से ज़िम्मेदारी की उम्मीद करना बेकार है बॉस।‘
‘...तो मर जाएं, हमारी बला से। यहां कौन सी कमी हो जाएगी ?‘-बॉस के इरादे बुलंद थे।
‘...परंतु नेपाल ही क्यों ?‘-छोटे ने पूछा।
‘विदेश के नाम से भव्यता आती है। प्रोग्राम की प्रोडक्शन वैल्यू बढ़ जाती है और प्रायोजक की जेब से ज़्यादा पैसा निकलवाना आसान हो जाता है।‘-बॉस ने कहा।
तभी जानीश भी आ पहुंचा। बॉस ने उसका खड़े होकर स्वागत किया। इससे पता चला कि वह रूतबे में बॉस के बराबर है। वैसे भी बॉस उसके इलाक़े में रह रहा है। लूट का माल ये दोनों बराबर बांटते हैं। जंगलायतन वाला केवल दिहाड़ी पर इनके लिए दौड़-भाग करता है।
जानीश ने मेज़ पर रखी बोतल उठाई और पानी पीने लगा। पानी पीकर उसने एक लिस्ट बॉस की दी-‘इसमें उस सामान की लिस्ट है। जिनकी नेपाल में डिमांड है। ये सामान हम इधर से नेपाल ले जाएंगे।‘
‘एक बात का ध्यान रखना कि पेमेंट में असली नोट ही लेना। वहां नक़ली करेंसी भी चल रही है।‘-बॉस ने ध्यान दिलाया।
‘हम बदले में करेंसी नहीं लेंगे बल्कि चाइना का वह सामान ले लेंगे जिसकी इधर डिमांड है।‘-जानीश ने कहा।
‘यह तो तस्करी हो जाएगी।‘-छोटे ब्लॉगर ने याद दिलाया।
‘तस्करी न करें तो क्या मसख़री करें। ख़र्च कहां से निकलेगा ?‘
‘ख़र्च तो वह पुराना प्रायोजक दे ही रहा है।‘-छोटे ने अपनी टांग अड़ाई।
‘वह तो प्रॉफ़िट है। फिर वह बंटकर अपने हिस्से में आएगा भी कितना ?‘-जानीश ने कहा।
तभी दिल्ली से छिपकली डॉट कॉम वाले की कॉल आ गई। यह एक अलग गुट का मालिक है लेकिन ईनाम के धंधे में यह भी इनके साथ शामिल रहता है। इसकी परसेंटेज नहीं होती। यह ईनाम के लिए पार्टी ख़ुद तैयार करता है। उनसे वुसूली भी ख़ुद करता है और थोड़ा बहुत ख़र्च के नाम पर बॉस को दे देता है। यह मरने की कगार पर है लेकिन सुधरने की कोई फ़िक्र नहीं है। अब भी ‘नारी‘ पर छींटाकशी करता रहता है।
दिल्ली से लखनऊ तक बड़े ब्लॉगर्स का यही हाल है। शायद नेपाल तक भी यही हाल हो और न भी होगा तो अब हो जाएगा। 

4 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
साझा करने के लिए आभार...!

devendra gautam said...

dilchasp...!

सारिक खान said...

VERY NICE

Jai Bhaskar said...

awsm :)