Thursday, September 22, 2011

क्या बड़ा ब्लॉगर टंकी पर ज़रूर चढता है ?

ऐसी मान्यता क्यों बन गई है कि बड़ा ब्लॉगर वही कहला सकता है जो कि टंकी पर चढ  जाए और ज़ोर ज़ोर  से चिल्लाए-'ब्लॉग वालो, तुमसे मेरी ख़ुशी  देखी नहीं जाती, तुम मुझसे जलते हो, मेरी टिप्पणियों से जलते हो, लो मैं चला/चली।'
यह सीन है तो फ़िल्म शोले का लेकिन दोहराया जाता है हिंदी ब्लॉग जगत में भी और यह दोहराया भी शायद इसीलिए जाता है कि यह सीन पसंद बहुत आता है चाहे शोले में किया जाए या शोले से बाहर।
इस सीन को लिखा तो मुसलमानों ने है लेकिन मुसलमानों से ज़्यादा  इसकी डिमांड उनमें है जो कि पैदा होते ही मुसलमानों को एक समस्या के रूप में देखना शुरू कर देते हैं जबकि वास्तव में वे ख़ुद  ही नई नई समस्याएं खड़ी  करते रहते हैं या खड़ी हुई समस्याओं के झाड  में ख़ुद  ही जाकर अपने सींग फंसा लेते हैं और जब उनके सींग फंस जाते हैं तो उन्हें पता चलता है कि उनके सींग लोहे के तो थे ही नहीं जैसा कि दुनिया को बता रखा था।
अब कैसे तो कह दे और कैसे मान ले कि मैं हार गया ?
अब वह कहता है कि ये महिला ब्लागर हैं न, पुरूष समझकर मुझे अपमानित कर रही हैं। ये मुझे ज़ालिम हाकिम के रूप में दिखाकर मुझे बदनाम करना चाहती हैं।
वह अपनी निजी खुन्नस को बड़ी चालाकी से दो वर्गों के टकराव में बदल देता है और तुरंत ही कुछ पुरूष ब्लॉगर महिला ब्लॉगर्स के खि लाफ  लामबंद भी हो जाते हैं लेकिन यह क्या यहां तो कुछ महिला ब्लॉगर्स भी समर्थन में आ जाती हैं ?
यह क्या खिचड़ी है भाई ?
दोनों जेंडर के लोग कैसे मनाने आ सकते हैं ?

डिज़ायनर ब्लॉगिंग इसी का तो नाम है भाई साहब .
दोनों जेंडर के लोग आते हैं और मनाते हैं।
इन दोनों जेंडर के लोगों को उसने कई स्तर पर जोड  रखा होता है।
कुछ से तो याराना होता है विचारधारा का।
तुम भी आग उगलते हो तो देखो हम भी मौक ा देखकर आग ही उगलते हैं।
तुम्हारे सीने में आग है तो हमारे सीने में भी दूध नहीं लावा ही है।
जो तुम, वो हम।
सो हमारे ब्लॉग पर आते रहा करो।
लेकिन कुछ लोग विपरीत विचारधारा के भी होते हैं इन मनाने वालों में।
ये उसके बाप होते हैं।
यानि कि बाप होते नहीं हैं लेकिन वह बना लेता है। बड़ा  ब्लॉगर वह होता है जिसके बाप एक से ज़्यादा हों।
जब बाप कई होंगे तो मांएं भी कई चाहिएं और जब मां-बाप बहुत से हो गए तो भाई-बहन की तो लाइन लग ही जाएगी।
यह है शानदार ब्लॉगिंग के लिए एक लाजवाब डिज़ायन।
इसके बाद सबसे ज़्यादा  आग बरसाऊ लीडर की जम कर तारीफ  करो और उसके तुरंत बाद किसी ऐसे झाड  में जाकर टक्कर मार दो जिसमें आग लगवानी हो।
समर्थक तुरंत आ जाएंगे वहां आग लगाने और बेचारा झाड  यही सोचता रहेगा कि इससे तो निपट लेता लेकिन इस पूरी फ़ौज से कहां तक लडूं ?
इधर झाड  परेशान खड़ा है और उधर हाईलैंड पर बनी टंकी पर पुरूष ब्लॉगर चढ़ा खड़ा है कि बस अब बहुत हो गया, हमें नहीं लिखना ब्लॉग।
उड़न बिस्तरी जी ने कहा कि 'अच्छा ठीक है बाबा, मत लिखो ब्लॉग, जैसा मन चाहे वैसा करो।'
यह क्या कह दिया ?
यह डायलॉग तो शोले में है ही नहीं, इसने कैसे बोल दिया ?
ब्लॉग जगत के भाई लोगों ने हुल्लड़  पेल दिया।
एक साहब बोले कि आप तो चुप रहते हैं ऐसे मामलों में, आप बोले ही क्यों ?
अब बेचारे उड़न बिस्तरी जी क्या बताएं कि भाई हम पक चुके हैं ये सीन देखकर, थोड़ा नयापन लाने के लिए बोले थे। अब यह कहना अच्छा थोड़े ही लगता कि यह सब नौटंकी चल रही है।
लेकिन उन्हें भी सोचना चाहिए कि कोई नौटंकी दिखा रहा है या कुछ और लेकिन दिखा तो फ़्री में रहा है न। आप उकता रहे हैं तो कम से कम उन्हें देखने दीजिए जिन्हें मज़ा आ रहा है।
मनाने वाले लोग जितने ज्य़ादा होते हैं, वह उतना ही बड़ा  हिंदी ब्लॉगर समझा जाता है। अपना भाव पता करने के लिए ज रूरी है कि बीच में कम से कम एकाध बार टंकी आरोहण ज रूर किया जाए।
लेकिन जो सचमुच बड़ा  ब्लॉगर होता है वह गंभीर होता है। हिंदी ब्लॉगिंग में जैसे जैसे गंभीरता और पुखतगी आती जाएगी, इस तरह की नौटंकियां बंद होती चली जाएंगी।
बहरहाल अब भी अच्छा ही दौर चल रहा है। ज्ञान नहीं मिल रहा है न सही, मज़ा तो आ रहा है न ?
मज़े  के लिए तो आदमी जाने कहां कहां जा चढ़ता  है और मज़े  की उम्मीद हो तो चढ़ा भी लेता है।
हिमालय पर भी आदमी चढ़ा  तो मज़े  के लिए चढ़ा , टंकी पर भी चढ़ता है तो आदमी मज़े  के लिए ही चढ़ता  है।
लेकिन ये सब जगहें चढ ने के लिए ठीक नहीं हैं। यहां चढ़ने  से मज़ा  तो कम आता है और आदमी का तमाशा ज़्यादा  बन जाता है।
एक और जगह है जहां चढ कर मज़ा भी ज़्यादा  आता है और पता भी किसी को नहीं चलता।
लेकिन यह उरूज (बुलंदी) हरेक को नसीब नहीं होता। इसे वही पाता है जो वास्तव में बड़ा ब्लॉगर होता है।

Wednesday, September 7, 2011

बड़ा ब्लॉगर वह है जो कमाता है

चित्र प्रतीकात्मक है , गूगल से साभार
बड़ा ब्लॉगर कमाता ज़रूर है। यह बड़े ब्लॉगर का मुख्य लक्षण है।
कोई नाम कमाता है, कोई इज़्ज़त कमाता है और कोई पैसा कमाता है।
कोई ईमानदारी से कमाता है और धोखाधड़ी से कमाता है।
कोई एक पम्फ़लैट तक नहीं लिख पाता लेकिन बड़ा ब्लॉगर सारा इतिहास लिख देता है। कोई अपनी किताब लिखकर बिना विमोचन के ही बांट कर धन्य हो जाता है लेकिन बड़ा ब्लॉगर अपनी एक किताब का दो दो बार विमोचन करा लेता है और वह भी दो दो राजधानियों में।
बड़े ब्लॉगर की बड़ी बात होती है।
‘एक से भले दो‘ की मिसाल सामने रखते हुए, वह अपने ही जैसा एक और पकड़ लेता है। बंगाल के तो जादूगर मशहूर हैं और दिल्ली के ठग भी एक ज़माने में काफ़ी मशहूर थे लेकिन बिहार के चोर ज़्यादा मशहूर नहीं हैं।
बहरहाल बंगाल के जादूगर भी बग़लें झांकने लगेंगे अगर दिल्ली का ठग और बिहार का चोर मिलकर काम करने पर आ जाएं तो...
और अगर ये ब्लॉगिंग में आ जायें तो बिना किताब छापे ही बेचकर दिखा दें और जो बड़े बड़े तीस मार खां बने फिरते हैं हिंदी ब्लॉगर, वे पैसे देंगे पहले और किताब उन्हें मिलेगी 4 माह बाद और वह भी 2 बार विमोचन होने के बाद।
जिस किताब का 2 बार विमोचन हो चुका हो, उसकी आबरू तो पहले ही तार तार कर दी गई है, अब उसमें क्या बचा है ?
कोई शरीफ़ आदमी तो उसे अपनी किताबों के साथ रखेगा नहीं और न ही कोई शरीफ़ किताब उसके पास रहने के लिए तैयार होगी।
ज़्यादातर किताबें बिना विमोचन की होती हैं।
उनका विमोचन बस पाठक ही करता है।
चलिए बहुत हुआ तो एक बार उसका आवरण उतारने का हक़ लेखक का भी मान लिया हमने।
बार बार उसका आवरण उतारना क्या उसका चीर हरण नहीं माना जाएगा ?
दुख की बात है कि आदमी अपनी इज़्ज़त बढ़ाने के लिए किताब की इज़्ज़त से खेल रहा है और बार बार स्टेज सजा कर सरे आम उसे नग्न कर रहा है।
अगर इन दोनों अवि-रवि के कपड़े कोई दो दो बार उतारे तो इन्हें कैसा लगेगा ?
पर इन्हें कोई इमोशंस की फ़ीलिंग थोड़े ही है,
ख़ैर हमारा फ़र्ज़ था इन्हें थोड़ी सी ख़ुराक़ देना सो दे दी।
आप लोग अपना वर्तमान देखिए और अपना भविष्य संवारिए।
आप लोग किसी नई पुरानी क्रांति के चक्कर में भी मत पड़िए।
सब फ़ालतू के धंधे हैं।
इतिहास लोगों को अपने ख़ानदान का पता नहीं है कि कहां से आए थे और कब आए थे ?
ऐसे में भोजपुरी ब्लॉगिंग का इतिहास कौन पढ़ेगा ?
नहीं ,
ऐसा नहीं है।
ब्लॉग जगत पढ़ेगा उनकी दोनों किताबें।
उनकी किताब क्या पढ़ेगा , उनकी किताब में अपना तज़्करा पढ़ेगा और अपने बीवी बच्चों को भी पढ़वाएगा कि देखो आप नहीं जानते हम कित्ती बड़ी तोप बन गए हैंगे, देखो किताब में हमारा फोटो भी है और हमारा नाम भी।
डेल कारनेगी ने कहा है कि ‘आदमी को सबसे प्यारी आवाज़ उसके नाम की आवाज़ लगती है‘
ठग इस बात को जानते हैं और वे लोगों की इसी कमज़ोरी का फ़ायदा उठाकर अपनी रददी को किताब के भाव बेच भागते हैं।
आदमी सब कुछ जानते हुए भी उसे लेने पर मजबूर है।
हक़ीक़त तो यह है कि बड़ा ब्लॉगर वास्तव में वह है जो इनकी ठगी का शिकार न हो और इनके ही कान उमेठ दे।

Monday, August 15, 2011

चिंता करने से पहले उचित जगह का चुनाव करता है बड़ा ब्लॉगर Right Place

चिंता करना बड़े ब्लॉगर का मुख्य लक्षण होता है। इस विषय में पिछली क्लास में आपको बताया जा चुका है। आज आपको यह बताया जाएगा कि किस शैली का हिंदी ब्लॉगर किस जगह पर ज़्यादा चिंता करता है ?
पिछले कुछ समय से हिंदी ब्लॉगिंग में मेंढक शैली का विकास बड़ी तेज़ी से हुआ है और इनमें भी कुछ ब्लॉगर बड़े माने जाते हैं। उदार मानवीय दृष्टिकोण से रिक्त होने के बावजूद चिंता करने का गुण इस शैली के बड़े ब्लॉगर्स में भी समान रूप से पाया जाता है। अंतर केवल यह है कि मनुष्य के सहज स्वभाव से आभूषित हिंदी ब्लॉगर तो किसी भी समय और किसी भी जगह चिंता कर सकता है लेकिन मेंढक शैली का बड़ा ब्लॉगर सदैव किसी ब़ड़ी और आलीशान जगह पर ही चिंता किया करता है।
मिसाल के तौर पर उसे अरण्डी के घटते हुए पौधों की चिंता करनी है या लुप्त होते हुए गिद्धों के बारे में चिंता करनी है तो ऐसा नहीं है कि वह एकाएक ही चिंतित हो उठे।
नहीं, वह मनुष्यों की तरह ऐसा नहीं करेगा।
पहले वह अपनी आलीशान कार से किसी आलीशान से पार्क, क्लब या हॉल-मॉल में जाएगा और फिर वहां की सबसे आलीशान जगह खड़े होकर सोचेगा कि इस बिल्डिंग को बनाने के लिए अरण्डी के कुल कितने पौधे काट दिए गए होंगे।
इस तरह से वह सच्चाई को प्रत्यक्ष तौर पर सबके सामने ले आता है।
इस तरह एक तरफ़ तो ब्लॉग जगत के सामने उसके चिंतन की गहराई आ जाती है और दूसरी तरफ़ उसके स्टेटस की ऊंचाई और उसकी जेब की मोटाई भी दिखाई देती है।
बड़ा ब्लॉगर वह होता है जो एक पंथ से कई काज एक साथ करता है।
यह बात भी पिछली क्लास में आपको बताई जा चुकी है।
इससे एक फ़ायदा यह भी होता है कि शान टपकाऊ सोच के अन्य ब्लॉगर्स भी वहां आ जुड़ते हैं और इतनी टिप्पणियाँ देते हैं कि बैठे बिठाए स्नेह और प्यार का एक अच्छा सा माहौल बन जाता है।
यह स्नेह और प्यार मालदारों का , मालदारों के द्वारा और केवल मालदारों के लिए ही होता है।
बड़ा ब्लॉगर अपने बच्चों के शादी ब्याह के  लिए हैसियतदार मेहमानों का जुगाड़ भी यहीं से कर लेता है। किराये के मेहमानों का चलन अभी हमारे मुल्क में आम नहीं हुआ है। पहले तो शादी ब्याह में खाना घराती ही अपने हाथ से खिलाया करते थे लेकिन अब यह सब व्यवस्था होटल वाले के ज़िम्मे हो चुकी है लेकिन मेहमानों का इंतेज़ाम अभी तक ख़ुद ही करना पड़ता है।
हो सकता है कि आने वाले समय में यह ज़िम्मेदारी भी होटल वाले पर ही डाल दी जाए तब उसकी तरफ से ऑर्डर और पेशगी मिलते ही कोई भी बड़ा ब्लॉगर आसानी से यह काम कर सकता है। लोगों के निजी समारोह में रौनक़ बढ़ाने का काम भी मेंढक शैली के ब्लॉगर्स से लिया जा सकता है। एक प्रकाशक के समारोह में इसका सफल परीक्षण किया ही जा चुका है।
ब्लॉगर मीट के नाम पर सबको जमा कर लिया, दूल्हा दुल्हन वालों की शोभा भी बढ़ जाएगी और आपस का मिलना मिलाना और खाना पीना भी हो जाएगा। ब्लॉगर मीट में अभी तक केवल खाना और खाने के बाद पीना ही हुआ है। खाना और पीना यहां भी हो जाएगा। जो कैश मिलेगा , उसे बड़ा ब्लॉगर बांट भी सकता है और पूरा का पूरा अपनी जेब में भी रख सकता है और तब हिंदी ब्लॉगिंग एक दूध देने वाली गाय बन जाएगी। जब ब्लॉगर्स ज्वलंत मुददों पर समझ में न आने वाले स्टाइल में बात करते दिखेंगे तो पूरे दार्शनिक से दिखेंगे, जिससे कुछ का स्पेशल पेमेंट भी वसूल किया जा सकता है।
मेंढक शैली के बड़े ब्लॉगर की सोच बहुत गहरी होती है। वह सदा कल्याण की बात ही सोचता है, केवल अपने और अपनों के कल्याण की।
लोगों को चाहिए कि वे उस पर शक न किया करें और जिनसे वह अलग रहने के लिए कहे बिना किसी सवाल के उनसे अलग हो जाया करें।
पूरी पॉलिसी हरेक को बता दी जाएगी तो उसकी सीक्रेसी ख़त्म हो जाएगी।
ब्लॉगिंग के उत्साह से भरा हुआ ब्लॉगर तो उनके इशारे से ही सारी बात समझ लेता है और फिर अपनी टिप्पणी में समझाने की कोशिश भी करता है मगर इशारे में ही। दूसरों की समझ में न भी आए तब भी उन्हें मान लेना चाहिए कि बड़ा ब्लॉगर है तो बात भी कुछ बड़ी ही होगी। इससे अपने ब्लॉग पर टिप्पणी भी मिलती रहती है और ब्लॉगर्स मीट में खाने पीने का मौक़ा भी। ज़रा सी भी किंतु परंतु की तो वह समझेगा कि आप उसके कुएं के नहीं हैं।
बहरहाल बात यह हो रही थी कि कितनी ही मामूली चीज़ की चिंता क्यों न की जाए लेकिन जगह आलीशान होनी चाहिए और उसका फ़ोटो भी स्टाइल में ही होना चाहिए। मेंढक शैली का बड़ा ब्लॉगर इन बातों का ख़ास ख़याल रखता है।

Tuesday, June 14, 2011

बड़ा ब्लॉगर ब्लॉगवन में शेर होता है तो सच की दुनिया में हाथी

'झूठ के नाख़ून अभी इतने लंबे नहीं हुए कि वह सच का चेहरा नोच सके।'
पहले तो आप यह डायलॉग पढ़िए और बताइये कि यह डायलॉग आपको कैसा लगा ?
यह किसी फिल्म का डायलॉग नहीं है । इसे हमने अभी अभी लिखा है ।
अब आपकी आज की क्लास शुरू करते हैं ।
बड़ा ब्लॉगर सच के लिए लड़ता है और वह झूठ के दावेदारों को ढेर कर देता है। बड़े बड़े मुंह की खाकर , मुँह छिपाकर और दुम दबाकर भाग लेते हैं । ये सभी बीच चौराहे पर नंगे हो चुके हैं । इनकी नाक कट चुकी है । अपनी इज़्ज़त गंवाने वाले ये ब्लॉगर दिल में ख़ार खाए बैठे रहते हैं । ऊपरी दिल से ये पोस्ट पर आते भी हैं और सराहते भी हैं लेकिन इनके अहंकार का ज़ख़्मी साँप अंदर ही अंदर फुंकारता रहता है । बड़ा ब्लॉगर भी इनकी टिप्पणियों के बदले में आभार प्रकट करता रहता है लेकिन उसे पता है कि जो शत्रु डर कर, हार कर या असहाय हो कर संधि करता है वह कुछ समय बाद शक्ति अर्जित करके पलट कर हमला ज़रूर करता है ।
वह उस हमले को ठीक उसी दिन जानता है जिस दिन शत्रु उसके सामने संधि का प्रस्ताव रखता है ।
बड़ा ब्लॉगर मनु स्मृति , चाणक्य नीति , विदुर नीति, रामायण, महाभारत , भृतहरि शतकं , पंचतंत्र , हितोपदेश और गीता सब कुछ पढ़े हुए होता है । इन सभी में शत्रु का मनोविज्ञान और उसकी चालबाज़ियों का पूर्ण विवरण मौजूद है । कोई भी शत्रु इनमें वर्णित चालबाज़ियों से हटकर कोई नई चालबाज़ी हरगिज़ नहीं कर सकता। सभी संभावित चालों को बड़ा ब्लॉगर जानता है और अपने दुश्मनों को भी वह पहचानता है । शिखंडी को भी वह चिन्हित कर लेता है।
वह जानता है कि इंजीनियर अब उसके लिए लाक्षागृह नहीं बनाएगा । कोई भी बूढ़ा दुश्मन उस पर सीधे हमला नहीं करेगा और दूर बैठे दो चार अधेड़ नास्तिक भी कुछ करने में समर्थ नहीं हैं ।
बस वे अपनी फ़र्ज़ी आई डी से कुछ कमेंट करके यही जता सकते हैं कि आप जिस शहर में रहते हैं वह बुलंद है और आपके कंधों पर तीन शेर ग़ुर्रा रहे हैं ।
दूर से वे मात्र इतना ही जान पाते हैं और समझते हैं कि इसे तो हम नियमावली दिखा कर ही दबा लेंगे लेकिन अगर वे इंजीनियर से संपर्क करें तो उन्हें पता चल जाएगा कि इस ऊँचे शहर का MLA कौन है और कैसा है ?
कोई शहर ऐसा नहीं है जहाँ उसके आदमी न हों । जिसने उसे न देखा हो वह अमिताभ बच्चन की सरकार देख ले या हॉलीवुड की गॉड फ़ादर।
मालिक का नाम बड़े ब्लॉगर को हरेक से आदर दिलाता है , पुलिस से भी और डॉन से भी । हरेक उससे पूछता है कि कोई काम हो तो बताओ ।
बड़ा ब्लॉगर उन्हें क्या काम बताए ?
कोई झगड़ा रीयल वर्ल्ड में जब है ही नहीं तो उन्हें आख़िर क्या काम बताया जा सकता है ?
बड़ा ब्लॉगर ब्लॉगवन में शेर होता है तो सच की दुनिया में हाथी।
हाथी मेरे साथी ।
वे सभी फ़िल्में अच्छी हैं जो कुछ न कुछ अच्छा दिखाती हैं और अंत में ज़ालिम की ज़िल्लत भरी मौत पर ही ये फ़िल्में ख़त्म होती हैं ।

Sunday, June 12, 2011

डर को जीत कर ही लिखता है 'बड़ा ब्लॉगर'

'How to stop worring and start living ?' में डेल कारनेगी जी ने चिँता और तनाव से मुक्ति पाने के बहुत से तरीक़े बताए हैं । उनमें से एक तरीक़ा यह है कि आदमी जो भी कारोबार , नौकरी या आंदोलन कर रहा है । उसमें बुरे से भी बुरा जो कुछ संभव हो , अपने लिए उसकी कल्पना करे और अपने मन को उस नुक़्सान को सहने के लिए तैयार कर ले । यह आसान नहीं है लेकिन जैसे ही आदमी यह अभ्यास करता है वैसे ही वह डर से आगे निकल कर वहाँ पहुँच जाता है जहाँ जीत है ।
ब्लॉगिंग करने वालों का जीवन पहले से ही कई तरह के तनाव से भरा होता है । उससे मुक्ति पाने के लिए वे ब्लॉगिंग शुरू करते हैं लेकिन यहाँ सुख के साथ कम या ज्यादा कुछ न कुछ दुख और चिंता उन पर और सवार हो जाती है । नज़रिए का अंतर भी यहाँ आम बात है और बदतमीज़ी भी ।
'कौन बनेगा सर्वेसर्वा ?' की कोशिश में यहाँ गुट भी बने हुए हैं और गुट बनते ही गुटबाज़ी के लिए हैं । गुटबाज़ी से टकराव और टकराव से केवल तनाव पैदा होता है । जो बदमाश है वह यहाँ धमकियाँ देता है कि जान से मार दूँगा और जो क़ानून का जानकार है वह क़ानूनी लक्ष्मण रेखा खींचता रहता है कि कौन ब्लॉगर क्या कर सकता है और क्या नहीं ?
ग़ुंडा हो या वकील , काम दोनों डराने का ही करते हैं।
डराता कौन है ?
याद रखिए जो ख़ुद डरा हुआ होता है वही दूसरों को डराता है । अपना डर छिपाने और दूसरों को डराने की कोशिश तनाव को जन्म देती है । ऐसी कोशिशें छोटेपन का लक्षण होती हैं।
बड़ा ब्लॉगर निर्भय होता है। वह मानता है कि उसका परिवार , उसका रोज़गार और उसका जीवन जो कुछ भी उसके पास है वह उनमें से किसी भी चीज़ का मालिक नहीं है । इन सब चीजों का मालिक वास्तव में सच्चा मालिक है और वह स्वयं तो केवल एक अमानतदार है । वह इन चीजों को लेने में भी मजबूर है और इन्हें देने में भी ।
जो चीज़ उसे दी गई है वह उससे एक दिन ले ली जाएगी । मालिक
दुनिया में निमित्त और सबब के तौर पर चाहे किसी दुश्मन को ही इस्तेमाल क्यों न करे लेकिन होता वही है जो मालिक का हुक्म होता है ।
सत्य और असत्य के इस संघर्ष में सब कुछ ईश्वर की योजना के अनुसार ही होता है लेकिन आदमी अपने विवेक का ग़लत इस्तेमाल करके खुद को सच्चे मालिक और मानवता का मुजरिम बना लेता है ।
यह तत्व की बात है और जो तत्व को जानता है उसे कोई चीज़ कभी नहीं डराती।
याद रखिए , चीज़ें ,घटनाएं और आदमी आपको नहीं डरातीं बल्कि आपको डराता है उन्हें देखने का नज़रिया।
ज्ञान आता है तो डर ख़ुद ब ख़ुद चला जाता है और जैसे ही डर से मुक्ति मिलती है आदमी बड़ा ब्लॉगर बन जाता है ।

Friday, June 10, 2011

अंतर्विरोध में नहीं जीता है बड़ा ब्लॉगर

आदमी स्वभाव से महत्वाकांक्षी और जल्दबाज़ होता है । वह समाज में बड़े स्तर पर सकारात्मक बदलाव का इच्छुक होता है। वह सुनहरे भविष्य के सपने अपनी पसंद के रंग की ऐनक से देखता है और जब उसी रंग में रंगा हुआ कोई आदमी या दल उसे रंगीन सपने दिखाता है तो उसे लगता है कि वह अवसर आ चुका है जिसका उसे इंतज़ार था । वह तुरंत ऐलान कर देता है कि 'बस या तो अभी वर्ना कभी नहीं ।'
ऐसा आदमी सच को नहीं जानता और जब उसकी कल्पनाएं हक़ीक़त नहीं बनतीं तो उसका अन्तर्मन हा हा कार कर उठता है । तब भी वह अपनी जल्दबाज़ी को दोष नहीं देता और न ही अपने मार्गदर्शक व्यक्ति और दल की ख़ुदग़र्ज़ी पर ही नज़र डालता है । इसके बजाय कभी तो वह सत्ता पर क़ाबिज़ पार्टी को कोसता है , कभी समाज के बुद्धिजीवियों की समझ पर अफ़सोस जताता है और कभी मीडियाकर्मियों पर बिक जाने या डर जाने का इल्ज़ाम लगाता है । अपनी आशाओं की टूटी किरचियाँ लेकर वह मन ही मन सोचता रहता है कि आख़िर लोग सकारात्मक तब्दीली के लिए अपना जी जान लड़ाने से अपना जी क्यों चुरा रहे हैं ?
क्राँति तो बस दरवाज़े पर ही खड़ी थी लेकिन लोग हैं कि क्राँतिकारी जी महाराज की ही खिल्ली उड़ा रहे हैं ?
लानत है ऐसे लोगों पर ।
मैंने साल भर तक इन्हें इतनी अच्छी अच्छी बातें सुनाईं लेकिन ये फिर भी राह पर न आए , तो आख़िर हमारे नेता और हम लोग किसके लिए लड़ रहे हैं ?

ऐसे विचार आदमी के मन में आते हैं । एक साधारण ब्लॉगर के मन में भी ऐसे विचार आते हैं और तब वह अन्तर्विरोध में जीने लगता है । जिसकी वजह से उसका मन ब्लॉगिंग से विरक्त हो जाता है । एक छोटे ब्लॉगर में ये लक्षण पाया जाना सामान्य बात है ।
बड़ा ब्लॉगर वह है जो बहुत पहले ही इस मंजिल को पार कर चुका होता है। वह जान चुका होता है कि तब्दीलियाँ हमेशा धीरे धीरे आती हैं और वह यह भी जान लेता है कि जैसे उसे एक रंग पसंद है वैसे ही दूसरे लोगों को भी कोई न कोई रंग पसंद है और उनमें से हरेक आदमी एक ही सुनहरे सपने को अपनी पसंद के रंग में ढल कर हक़ीक़त बनते देखना चाहते हैं । सुनहरा सपना लगातार साकार होता जा रहा है बिना किसी नेता के ही लेकिन उन्हें उसकी कोई खूबी नज़र नहीं आती। बड़ा ब्लॉगर जानता है कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन का सीधा संबंध लोगों की सोच से है । लोगों की सोच जैसी और जितनी बदलती जाएगी , समाज में भी वैसी और उतनी ही तब्दीली आती चली जाएगी और जब समाज के ज़्यादातर लोगों में सत्य और न्याय की चेतना का विकास अपने टॉप पर पहुँच जाएगा तो समाज में वह बड़ी तब्दीली आ जाएगी जो कि वाँछित है। यह हज़ार पाँच सौ लोगों के बल पर नहीं आएगी और न ही दो चार साल में आ जाएगी । एक आदमी के बल पर एकाध सत्याग्रह से तो बिल्कुल नहीं आएगी और बुज़दिल नेता और ख़ुदग़र्ज़ साथियों के कारण तो इस तब्दीली की प्रक्रिया ही मंद पड़ जाएगी और वे तो इसे रिवर्स कर देने के 'हिडेन एजेंडे' पर चल रहे हैं।
बड़ा ब्लॉगर इस सच्चाई को जानता है इसीलिए वह अपने कर्म पर ध्यान देता है जिसके ज़रिए से समाज में तब्दीली आनी है।
छोटा ब्लॉगर सोचता है कि ब्लॉगिंग छोड़कर ज़मीनी स्तर पर कुछ काम किया जाए जबकि बड़ा ब्लॉगर ब्लॉगिंग, ज़मीनी और आसमानी सब काम एक साथ करता है । वह अपने मिशन से ब्लॉगर्स को इंट्रोड्यूस कराता है । ब्लॉगिंग का ज्ञान समाज में बाँटकर अपने समर्थन और लोकप्रियता का दायरा बढ़ाता है और इस संपर्क में प्राप्त अनुभवों को वह ब्लॉग और अख़बार , दोनों जगह शेयर करता है । इस तरह वह ज्ञान अर्जन और ज्ञान वितरण की cyclic process के ज़रिए समाज में सकारात्मक तब्दीली लाने में अपने हिस्से का योगदान करता रहता है । इसके नतीजे में उसकी लोकप्रियता बढ़ती चली जाती है । जैसे जैसे उसका कद बढ़ता जाता है वैसे वैसे वह बड़े से और ज्यादा बड़ा ब्लॉगर बनता चला जाता है।
हम अपने आप को अपनी क्षमताओं के आधार पर आँकते हैं जबकि लोग हमें हमारे द्वारा किए गए कामों के आधार पर आँकते हैं ।
अच्छी सोच रखना अच्छी बात है लेकिन उसे पूरा करने के लिए हक़ीक़त जानना बहुत ज़रूरी है और हक़ीक़त यह है कि बड़ी तब्दीलियाँ बड़े धैर्य वाले लोगों की बड़ी मेहनत से आती है । जो खोखले दावे करता है और झूठे नारे लगाता है, उससे कुछ खास हो नहीं पाता सिवाय ऊँची छलाँग लगाने के । समाज के लिए उसका 'योग'-दान बस यही होता है ।

Sunday, June 5, 2011

'मनुष्य के स्वभाव और प्रकृति के धर्म , दोनों का ज्ञान' रखता है बड़ा ब्लॉगर Thought provoking

'बोलने और लिखने का मक़सद होता है सत्य की गवाही देना' या हम कह सकते हैं कि होना चाहिए। ब्लॉग लिखा जाए या कुछ और , जो कुछ भी लिखा जाए इसी मक़सद के तहत लिखा जाए। एक बड़ा ब्लॉगर ऐसा मानता है। सत्य में प्रबल आकर्षण शक्ति होती है और इसे हरेक आत्मा पहचानती है। लिहाज़ा जो सत्य को अपने लेखन की बुनियाद बनाता है। वह अनायास ही लोकप्रियता के सोपान चढ़ता चला जाता है । इतना ही बल्कि वह अपनी विजय का सामान भी जुटा लेता है क्योंकि 'सत्यमेव जयते' कोई कहावत नहीं है बल्कि एक नियम है जिसे कहावत में बयान किया गया है। जीतने वाली चीज़ है सत्य और आपको इस धरती पर सत्य का साक्षी बनाकर पैदा किया गया है अर्थात आपको जीतने के लिए ही पैदा किया गया है । विजय उल्लास , ऐश्वर्य और आनंद सब कुछ साथ लाती है लेकिन इस विजय के लिए इंसान को दूसरों से नहीं बल्कि अपने आप से लड़ना पड़ता है । अपने खिलाफ़ खुद खड़ा होना पड़ता है। जो आदमी खुद अपने खिलाफ खड़ा हो सकता है । वही निष्पक्ष होकर विचार कर सकता है और अपनी गलती के ग़लत और दूसरे के सही को सत्य कह सकता है। अपने मिथ्या अभिमान को जीतने और सत्य को पाने वाला आदमी यही होता है । अब अगर आप सत्य को सामने लाते हैं तो आप अपने जन्म के मक़सद को पूरा करते हैं और अगर आप अपनी रीयल फ़ीलिग्स के ख़िलाफ़ लिखते हैं तो अपनी आत्मा का हनन करते हैं । आप चाहें या न चाहें लेकिन अपने हरेक अमल के ज़रिये या तो आप अपना विकास कर रहे हैं फिर अपनी आत्मा का हनन।
बड़ा ब्लॉगर कहलाने का हक़दार वह है जो अपनी आत्मा का हनन कभी नहीं करता। वह सदा सत्य ही लिखता है।
वह पोस्ट भी लिखता है और टिप्पणी भी, जो भी लिखता है सत्य ही लिखता है। कभी वह टिप्पणी को पोस्ट बना देता है और ऐसा वे भी करते रहते हैं जो कि बड़े ब्लॉगर वास्तव में नहीं होते लेकिन कभी कभी बड़ा ब्लॉगर दूसरों के ब्लॉग पर अपनी टिप्पणी को भी एक पोस्ट का रूप दे देता है और दूसरे ऐसा नहीं कर पाते।
इससे बड़े ब्लॉगर को भी लाभ होता है और उस पोस्ट को भी जिस पर कि वह टिप्पणी करता है। उस पोस्ट पर अब दिल से निकली हूई टिप्पणियाँ आने लगती हैं। उसकी टिप्पणियाँ Thougqt provoking होती हैं। चिंतन की ठप्प पड़ी प्रक्रिया को चालू करना ही उसका मक़सद होता है। इसीलिए उसकी टिप्पणियाँ अद्भुत हुआ करती हैं।
कोई नहीं जानता कि किस पोस्ट या टिप्पणी में किस मुद्दे को उठाकर वह किसे और कब झिंझोड़ डाले ?
इस प्रकार वह एक सस्पेंस बनाए रखता है जिससे उसकी पोस्ट और टिप्पणियों के लिए सभी ब्लॉगर्स की उत्सुकता सदा बनी रहती है चाहे वे उसके समर्थक हों या फिर उसके विरोधी। उसके विरोधी उस पर निगरानी रखने की नीयत से उसकी पोस्ट और टिप्पणियाँ पढ़ते हैं लेकिन वे नहीं जानते कि हल्के हल्के Data उनके mind में ट्रांसफ़र हो रहा है और वे क्रमिक रूप से प्रबुद्ध होते जा रहे हैं और एक समय वह आएगा जब उनकी चेतना का विकास इतना हो जाएगा कि वे भी बड़े ब्लॉगर बन जाएंगे अर्थात वे भी सत्य के साक्षी बन जाएँगे।
अतः हम कह सकते हैं कि बड़ा ब्लॉगर वह है जो सत्य के सांचे में खुद के साथ साथ दूसरों को भी ढालता रहता है , धीरे-धीरे और खेल-खेल में । याद रहे कि खेल इंसान को पसंद है और धीरे-धीरे प्रकृति का स्वभाव और उसका नियम है। बड़ा ब्लॉगर वह है जिसे मनुष्य के स्वभाव और प्रकृति के धर्म , दोनों का ज्ञान होता है। इंसान को बड़ा बनाने वाली चीज़ ज्ञान है। यह बात एक ब्लॉगर पर भी लागू होती है।

Sunday, May 29, 2011

‘टिप्पणी के भ्रष्टाचार‘ से मुक्त होता है बड़ा ब्लॉगर

डेल कारनेगी एक विश्व विख्यात लेखक हैं। आम तौर पर उनकी दो किताबें बहुत मशहूर हैं ‘हाउ टू स्टॉप वरीइंग एंड स्टार्ट लिविंग‘ और एक और जो इससे भी ज़्यादा मशहूर है। कुछ और भी किताबें उन्होंने लिखी हैं लेकिन वे इतनी मशहूर नहीं हैं।
क्या आप जानते हैं कि उनकी दूसरी मशहूर किताब का नाम क्या है ?, जिससे उन्हें पहचाना जाता है और दुनिया की हरेक बड़ी भाषा में उसका अनुवाद मौजूद है।
ख़ैर, इन किताबों को पढ़े हुए 25 साल से ज़्यादा हो गए। इन किताबों का मैं क़ायल हूं और चाहता हूं कि हरेक आदमी इन्हें ज़रूर पढ़े।
डेल कारनेगी की किताबें सकारात्मक विचार देती हैं।
लेकिन कहीं कहीं मैं उनसे सहमत नहीं हो पाता।
उन्हीं की तरह दूसरे बहुत से लेखकों ने भी लोगों को दोस्त बनाने की कला पर किताबें लिखी हैं। लोकप्रिय होने के लिए सभी एक ही सुझाव देते हैं कि आप किसी के बारे में अपनी व्यक्तिगत राय ज़ाहिर मत कीजिए और किसी के विचारों का खंडन मत कीजिए क्योंकि हरेक को अपने विचार प्रिय हैं और वह उन्हें सत्य मानता है। किसी के विचारों का खंडन करने के बाद उसके मन में आपके लिए दूरी और खटास पड़ जाएगी।
बात एकदम सही है लेकिन क्या हम इसका पालन कर सकते हैं या हमें इस उसूल का पालन करना चाहिए ?
जब हम किसी ब्लॉगर की पोस्ट पढ़ते हैं तो टिप्पणी करते हुए बहुत लोग ग़लत को ग़लत कहने के बजाय बचकर निकल जाते हैं।
क्या यह प्रवृत्ति सही है ?
बल्कि बहुत बार ऐसा भी देखा जाता है कि लोग ग़लत बातों का समर्थन करने लग जाते हैं मात्र अपने समर्थन को बनाए रखने के लिए, केवल इसलिए कि कहने वाला अपने ग्रुप का होता है।
क्या ऐसा करना सही होता है ?
कई बार ऐसा भी होता है कि बात सही होती है लेकिन उसे कहने वाला या तो अपने ग्रुप का नहीं होता है या फिर अपनी पसंद का नहीं होता है। ऐसे में भी उसकी सही बात को सही कहने का कष्ट नहीं किया जाता।
इसी तरह की और भी बातें हैं, जिन्हें हम ‘टिप्पणी में भ्रष्टाचार‘ की संज्ञा दे सकते हैं। किसी भी विषय में जब सत्य का पालन नहीं किया जाता तो वहां भ्रष्टाचार ख़ुद ब ख़ुद जन्म ले लेता है। इस समय हिंदी ब्लॉग जगत में यह भ्रष्टाचार आम है। इसके निवारण का उपाय केवल यही है कि सही को सही और ग़लत को ग़लत कहने में झिझक बिल्कुल भी नहीं होनी चाहिए, चाहे इसके लिए लोकप्रियता कभी भी न मिले या मिली हुई भी जाती हो तो चली जाए। केवल ‘सत्य‘ को ही अपना मक़सद बनाता है बड़ा ब्लॉगर। 

Friday, May 27, 2011

‘टिप्पणी का सच जानता है बड़ा ब्लॉगर'

टिप्पणियों के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है लेकिन अपने विद्यार्थियों के लिए आज हम एक ऐसा लेख पेश करेंगे जो हिंदी ब्लॉग जगत को आईना भी दिखाता है और सीखने वालों को बहुत कुछ सिखाता भी है। ज़रूरत बस एक नज़र की है। आईना देखने के लिए भी नज़र चाहिए और उसमें मौजूद ‘तत्व‘ को ग्रहण करने के लिए भी नज़र चाहिए।
जनाब सतीश सक्सेना जी का यह लेख मुझे बेहद पसंद है और इतना ज़्यादा पसंद है कि बिना उनसे औपचारिक अनुमति लिए ही उसे हम यहां पेश कर रहे हैं। यह औपचारिकता तब के लिए छोड़ दी है जबकि वह ख़ुद यहां कमेंट करने आएंगे।
...तो साहिबान, क़द्रदान लीजिए आज आपके सामने पेश है ‘टिप्पणी के बारे में सबसे बड़ा सच‘ 

टिप्पणियां देने की विवशता - सतीश सक्सेना
किसी भी लेख की महत्ता बिना टिप्पणियों के बेकार लगती है ,लगता है किसी वीराने में आ गए हैं ! और टिप्पणिया चाहने के लिए टिप्पणिया देनी बहुत जरूरी हैं ! सो हर लेख के तुरंत बाद ५० अथवा उससे अधिक जगह टिप्पणी करनी होती है तब कहीं २५ -३० टिप्पणियों का जुगाड़ होता हैं !  :-((
अब लम्बा लेख कैसे पढ़ें ..समझ ही नहीं आता ! ऐसे लेख पर टिप्पणी करने के लिए अन्य टिप्पणीकर्ता की प्रतिक्रिया देख कर उससे मिलती जुलती टिप्पणी ठोकना लगता होता है ! चाहे उस बेचारे का बेडा गर्क हो जाये :-)
  • अगर किसी बहुत बेहतरीन लेख का कबाड़ा करना हो तो पहली नकारात्मक टिप्पणी कर दीजिये फिर देखिये उस बेचारे की क्या हालत होती है ! बड़े बड़े मशहूर लोग उसकी कापी करते चले जायेंगे ! 
  • किसी अन्य टिप्पणी कर्ता जिसे आप विद्वान् समझते हों की टिप्पणी की कापी करना अच्छा लगेगा और लोग आपकी टिप्पणी को ऐवें ही नहीं लेंगे !
  •  
और हम जैसे मूढ़ लोग अपने आप पर और अपनी संगत पर हँसेंगे  ...दुआ करता हूँ कि कुछ लेख को ध्यान से पढने वाले भी आ जाएँ  तो इतनी मेहनत करना सार्थक हो ! मेरे जैसे मूढमति, टिप्पणी न करें तो ठीक ही होगा सो आज से टिप्पणी कम करने का प्रयत्न करूंगा , जिससे बदले में टिप्पणी न मिलें  और दुआ मानूंगा कि कम लोग पढ़ने आयें मगर वही आयें जो मन से पढ़ें !
:-))))                                                                            
                             ( यह लेख एक व्यंग्य है )
साभार : http://satish-saxena.blogspot.com/2010/11/blog-post_24.html


Sunday, May 22, 2011

वह क्या राज़ है जिसे जानने के बाद आदमी बड़ा ब्लॉगर बन जाता है ? Art OF Blogging


‘इस हाथ दे और उस हाथ ले।‘
कमेंट कमाने का यह मूल उसूल है।
आप किसी की शादी या सालगिरह पर जाते हैं तो कुछ दुआ के बोल देकर आते हैं और कुछ रक़म भी। कुछ समय बाद जब आपके यहां इसी तरह का कोई फंक्शन होता है तो लोग आपके यहां भी आते हैं और देकर जाते हैं, वही दुआएं और वही रक़म। हां, थोड़ा ऊपर नीचे भी हो सकता है।
याद रखिए कि अगर आपने किसी के यहां जाकर कुछ दिया  ही नहीं तो फिर आपको भी किसी से कुछ मिलने वाला नहीं है और न ही आपको किसी से कुछ पाने की उम्मीद ही रखनी चाहिए।
आप रक़म बांटेंगे तो लौटकर आपको भी रक़म ही मिलेगी और अगर आप टिप्पणियां बांटेंगे तो लौटकर आपको भी टिप्पणियां ही मिलेंगी। इस दुनिया में कोई आपको कुछ दे नहीं सकता और न ही देता है। दुनिया तो आपको तभी लौटाएगी जबकि वह आपसे कुछ पाएगी। बिना कुछ पाए आपको देने वाला दाता केवल एक रब है, वही सबसे बड़ा है और वह सबको देता है।
अगर आप बड़ा ब्लॉगर बनना चाहते हैं तो आप भी अपनी हद भर सबको दीजिए। बिना किसी से कुछ पाए दीजिए, किसी से कुछ पाने की उम्मीद रखे बिना दीजिए।
आप कभी इसलिए टिप्पणी मत कीजिए कि वह भी आपको लौटकर टिप्पणी दे। जो इस आशा के साथ टिप्पणी देता है वह छोटा ब्लॉगर होता है और सदा तनाव में जीता है। छोटी अपेक्षाएं ब्लॉगर के लिए सदा चिंता का कारण बनती हैं। छोटों से और ओछों से तो दुनिया पहले ही भरी हुई है। आपको ऐसा नहीं बनना चाहिए।
जो भी शीर्षक आपको अच्छा लगे, उस लेख पर जाइये और उसे पढ़कर ईमानदारी से अपनी राय दीजिए।
जब आप निरपेक्ष भाव से कुछ समय तक ऐसा करेंगे तो आप देखेंगे कि आपके ब्लॉग का टिप्प्णी सूचकांक ऊपर चढ़ता जा रहा है।
ये टिप्पणियां सच्ची होंगी और आपके लिए बौद्धिक ऊर्जा मुहैया करेंगी। लोगों की तरफ़ से आपको सही सलाह भी मिलेगी और जब आप उन पर ध्यान देंगे तो आपके लेख ही नहीं बल्कि आपके व्यक्तित्व तक में निखार आता चला जाएगा।
जितना निखार आएगा, आपकी बड़ाई में उतना ही इज़ाफ़ा होता चला जाएगा।
यह बात जो जान लेता है, वह बड़ा ब्लॉगर बन जाता है।

Saturday, May 21, 2011

'अपने दोनों हाथ में लडडू रखता है बड़ा ब्लॉगर' The complicated game

'बड़ा ब्लॉगर अपने दोनों हाथ में लडडू रखता है।'
बड़ा ब्लॉगर अपने समर्थकों के सहयोग से आगे बढ़ता है और अपने विरोधियों की छाती और उनके कंधों पर चढ़ता है । दोस्तों से काम तो दुनिया लेती है लेकिन विरोधियों की ऊर्जा को इस्तेमाल एक बड़ा ब्लॉगर ही कर सकता है । वह अपने समर्थन में लिखी गई पोस्ट को हिट करता और करवाता है और अपने विरोध में लिखी गई पोस्टों को भी। यहाँ तक कि उसके विरोधी उसके प्रचारक मात्र बनकर रह जाते हैं । जब कोई उसका विरोध नहीं करता तो बड़ा ब्लॉगर फ़र्ज़ी ब्लॉग बनाकर अपना विरोध स्वयं करता है । उस ब्लॉग पर प्रायः अन्य विरोधी ही टिप्पणी करते हैं और इस तरह वह अपने विरोधियों को चिन्हित कर लेता है और उनके इलाज पर उचित ध्यान देता है ।
ब्लॉग जगत में कोई नहीं जानता कि किस ब्लॉग से अपना विरोध वह स्वयं कर रहा है और किस ब्लॉग से सचमुच ही विरोध हो रहा है । इस तरह विरोधियों के विरोध की धार कुंद हो जाती है और उसे केवल प्रचार मिलता रहता है।

ऐसा करके वह अपने विरोधियों को पसोपेश में डाल देता है । अगर वे अपना विरोध बंद करते हैं तो वह निर्विरोध हो जाएगा जैसे कि दूसरे हैं और अगर उसका विरोध बदस्तूर जारी रखा जाए तो भी उसे प्रचार मिल रहा है ।
विरोधी ब्लॉगर जो भी करेगा वह बड़े ब्लॉगर का केवल फ़ायदा ही करेगा ।
एक बड़ा ब्लॉगर ऐसा सोचता है । आप भी ऐसे सोचेंगे तो बहुत जल्द आप भी एक बड़े ब्लॉगर बन जाएंगे।

Saturday, May 7, 2011

लखनऊ में आज सम्मानित किए गए सलीम ख़ान और डा. अनवर जमाल Best Blogger

बड़ा ब्लॉगर पूरी कोशिश करता है कि वह अपने पाठकों को ताज़ा जानकारी से बाख़बर रखे .
इसी कोशिश में आज 'मुशायरा' ब्लॉग पर एक पोस्ट आई और वादा किया गया कि इवेंट के फोटो भी जल्द ही दिखायेंगे.
सो जैसे  ही फोटो आये, आपके लिए हाज़िर कर दिए गए. यह प्रोग्राम चौ. चरण सिंह सहकारिता भवन लखनऊ में संपन्न हुआ.
समाज के जो तबक़े आधुनिक शिक्षा से पिछड़  गए हैं, उन तक शिक्षा का प्रकाश कैसे पहुंचे ? इस सम्मलेन का उद्देश्य यही था.
इस सम्मलेन का आयोजन 'आल इण्डिया उर्दू तालीम घर, लखनऊ' ने किया, जिसमें मुल्क के अलग अलग हिस्सों से बहुत से बुद्धिजीवियों और आलिमों ने भाग लिया. जिनमें अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त  मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली,  प्रोफ़ेसर अख्तरुल वासे (चेयरमैन उर्दू एकेडमी दिल्ली), डा. इस्लाम क़ासमी (सदर जमीअतुल उलेमा, उत्तराखंड), प्रोफ़ेसर अब्दुल वहाब ‘क़ैसर साहब (डायरेक्टर ऑफ़  एग्ज़ामिनेशन, मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद), डा. असलम जमशेदपुरी (उर्दू विभागाध्यक्ष चौ. चरण सिंह यनिवर्सिटी मेरठ), डा. साग़र बर्नी (अध्यक्ष उर्दू विभाग चै. चरण सिंह यूनिवर्सिटी, मेरठ) प्रोफ़ेसर तनवीर चिश्ती (गोचर पी.जी. कॉलेज, सहारनपुर), डा. ज़फ़र गुलज़ार (चै. चरण सिंह यूनि., मेरठ) और डा. असलम क़ासमी साहब (उत्तराखंड) के नाम प्रमुख हैं। सभी लोगों ने हाज़िरीने मजलिस को अपने आलिमाना ख़यालात से नवाज़ा। मीडिया की दुनिया की एक क़द्दावर हस्ती जनाब अज़ीज़ बर्नी साहब किसी मजबूरी की वजह से रू ब रू न आ सके। उन्होंने तक़रीबन 10 मिनट तक कॉन्फ़्रेंस के ज़रिये सभा को संबोधित किया और उर्दू तालीम घर की कोशिशों को सराहा। इस प्रोग्राम में संभल से आए जनाब डा. फ़हीम अख़तर साहब और अनवर फ़रीदी साहब और दीगर शायरों ने अपने कलाम से भी दर्शकों को अम्नो-मुहब्बत का बेहतरीन संदेश दिया। 


इस मौक़े पर सलीम ख़ान साहब को हिंदी ब्लॉगिंग के ज़रिये एकता की राह के पत्थर तोड़कर उसे हमवार करने के लिए बेस्ट ब्लॉगर का अवार्ड मौलाना ख़ालिद रशीद फ़िरंगी महली के हाथों दिया गया। इंटरनेट के ज़रिये लोगों तक इल्म आम करने के लिए उन्होंने जो निःस्वार्थ योगदान संस्था को दिया है, उसकी भी संस्था द्वारा भरपूर तारीफ़ की गई। मौलाना ख़ालिद साहब ने हमें भी अपने हाथों से बेस्ट ब्लॉगर का अवार्ड दिया। हमें यह अवार्ड उर्दू से हिंदी अनुवाद के लिए दिया गया जो कि हमने कई उर्दू किताबों का हिंदी में किया है और इस तरह हिंदी ब्लॉगर्स के लिए उर्दू लिट्रेचर को समझना मुमकिन बना दिया। दीगर ब्लॉग के साथ ‘मुशायरा‘ ब्लॉग की भी तारीफ़ की गई। इस ब्लॉग पर भी हमने बहुत से शायरों के कलाम को उर्दू से हिन्दी में अनुवाद करके पेश किया है . 
हमने सभा को संबोधित करते हुए एक संदेश भी दिया। इस मौक़े पर डा. असलम क़ासमी साहब की एक किताब ‘उर्दू तन्क़ीद और उसका पसमंज़र‘ का विमोचन भी किया गया, जो कि उनकी थीसिस है जिसके लिए उन्हें डॉक्ट्रेट से नवाज़ा गया है।. इस प्रोग्राम की अध्यक्षता मौलाना मुहम्मद फुरकान  क़ासमी साहब ने की  जो कि एक हिन्दोस्तान भर की मस्जिदों की समिति के ज्वाइंट सेक्रेटरी हैं.
हिंदी ब्लॉगिंग की दुनिया से इस प्रोग्राम में हमारे अलावा सलीम ख़ान, अनवार अहमद साहब, डा. असलम क़ासमी, डा. अयाज़ अहमद, तारिक़ भाई, फ़िरोज़ अहमद, डा. डंडा लखनवी, डा. शाहिद हसनैन व अन्य शामिल थे। कुछ ब्लॉगर्स के अकाउंट्स फ़ेसबुक पर हैं। पूरे कार्यक्रम की कवरेज करने के लिए मीडिया भी मौजूद था और वीआईपी की सुरक्षा के लिए ख़ासी तादाद में सुरक्षाकर्मी भी मौजूद रहे। 
प्रोग्राम की शुरुआत कुरआन शरीफ़ की तिलावत से हुई और ख़ात्मा दुआ पर हुआ . 
सुरक्षा के लिए मौजूद पुलिसकर्मी
वीआईपी मेहमानों की सुरक्षा के लिए मौजूद दरोगा
हिन्दी ब्लॉगर्स की टीम प्रोग्राम के शुरू में 
सलीम ख़ान प्रोफ़ेसर असलम जमशैदपुरी साहब को फूल पेश करते हुए 
प्रोफ़ेसर साहब एक हिन्दी ब्लॉगर भी हैं.

स्टेज पर मौजूद सम्मानित मेहमान  
मौलाना मुहम्मद फुरकान  क़ासमी
डा. डंडा लखनवी, सलीम खान, अनवर जमाल, डा. अयाज़,डा. सुरेश उजाला एडिटर,  अनिल   
मंच का विहंगम दृश्य 
डा. असलम क़ासमी 
सलीम खान स्टेज पर  
डा. अनवर जमाल स्टेज पर 
डा. अनवर जमाल सभा को संबोधित करते हुए 
एक विहंगम दृश्य 
अनवर जमाल एक भावपूर्ण मुद्रा में 
 मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली डा. अनवर जमाल को ईनाम से नवाज़ते हुए 
मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली सलीम खान  को बेस्ट ब्लॉगर के ईनाम से नवाज़ते हुए  डा.
एक यादगार लम्हा सलीम खान के लिए

मीडियाकर्मी  रिपोर्टिंग करते हुए

Thursday, May 5, 2011

अगर आप बड़ा ब्लॉगर बनना चाहते हैं तो आपको भी अपने अंदर निरालापन ज़रूर लाना होगा Be a unique blogger


बड़ा ब्लॉगर कोई नया काम नहीं करता बल्कि वह हर काम को एक नए अंदाज़ में करता है जैसे कि शौचालय में समय गुज़ारना। शौच का जीवन में बड़ा महत्व है। इंसान की पहचान उसके शौच से ही होती है। इंसान वह नहीं होता जो कि वह बाहर से नज़र आता है बल्कि अस्ल इंसान वह होता है जो कि अंदर होता है। इंसान की हक़ीक़त उसके अंदर ही छिपी हुई होती है बल्कि हक़ीक़त यह है कि हर चीज़ की हक़ीक़त ही अंदर छिपी हुई होती है। सेहत और बीमारी का राज़ भी इंसान के अंदर ही छिपा हुआ होता है। उसके राज़ को भी ठीक से तभी जाना जा सकता है जबकि उसके अंदर से आने वाली चीज़ को देख लिया जाए।
पुराने ज़माने में हकीम-वैद्य मरीज़ की नाड़ी देखने के साथ-साथ उसके अंदर से निकले मल-मूत्र को भी चेक करते थे। नया ज़माना आया तो काढ़ों के बजाय इंजेक्शन और कैप्सूल चल गए लेकिन पैथोलॉजी में आज भी मरीज़ के मल-मूत्र की जांच की जाती है। जो कुछ इंसान के अंदर से निकलता है, वह बता देता है कि इसके अंदर क्या है ?
शरीर से स्थूल मल निकलता है और मन से सूक्ष्म, जो कि मुंह के रास्ते बाहर निकलता है। इंसान के अंदर से निकलने वाले विचार ही वास्तव में उसका सही परिचय होते हैं।
इंसान जो कुछ बोलता है या जो कुछ लिखता है, उन सबमें उसके अंदर से निकलने वाले विचार होते हैं, उन्हें देखकर ही आप समझ सकते हैं कि यह आदमी कितना ठीक है और कितना ग़लत ?
जब आप किसी ब्लॉगर की पोस्ट पढ़ें तो इसी तरह जागरूक होकर पढ़ें। इसका फ़ायदा आपको यह मिलेगा कि अगर उसके विचारों में किसी भी तरह की कोई गंदगी होगी तो आप उसे स्वीकार नहीं करेंगे। कोई कितना ही प्यारा दोस्त क्यों न हो लेकिन उसकी गंदगी को अपने सिर पर उठाकर कोई नहीं घूमता लेकिन ब्लॉग जगत में यह एक आम बात है कि दोस्त ने क्या कहा है ?
और उसमें कितनी गंदगी भरी हुई है ?
यह देखे बिना ही उसके विचार को तुरंत अपने मन में समेट लेते हैं और उसे दस जगह और परोस आते हैं।
जो ऐसा करता है, वह बड़ा ब्लॉगर नहीं होता।
बड़ा ब्लॉगर वही होता है जो कि कुछ भी अपनाने से पहले उसकी गुणवत्ता और उसकी उपयोगिता को आज़माकर देखता है और सच्चा और अच्छा देखने के बाद ही उसे अपनाता है।
वैद्य और हकीम मानते हैं कि ज़्यादातर बीमारियों के पीछे पेट की गड़बड़ी होती है। अगर पेट को सही कर दिया जाए तो मरीज़ बहुत से मर्ज़ों से मुक्ति पा सकता है।
जिन लोगों ने इंसान के मन को अपने अध्ययन का विषय बनाया है, उन्होंने पाया है कि गुस्सा, जलन और लालच जैसे जज़्बात इंसान की सेहत ख़राब करते हैं। यही वजह है कि जो लोग इन बुरे जज़्बात से बचते हैं, उन लोगों की सेहत आम तौर पर अच्छी होती है।
यह बिल्कुल सादा सी बातें हैं। इनमें कोई हंसी-मज़ाक़ और व्यंग्य नहीं है।
बहरहाल आदमी सीखना चाहे तो तन्हाई में भी सीख सकता है और वह न सीखना चाहे तो कॉलिज और यूनिवर्सिटी में भी नहीं सीख सकता। सीखने का जज़्बा भी इंसान के अंदर ही होता है, बाहर की चीज़ें तो उसे सिर्फ़ रास्ता दिखाती हैं।
बड़ा ब्लॉगर वही है जो हर समय कुछ न कुछ नया सीखता रहता है। उसे हर जगह एक पोस्ट का विषय नज़र आता है। जब वह शौचालय में होता है तो भी वह मनन कर रहा होता है कि वह अपने पाठकों को नया क्या दे सकता है ?
और जब वह बाहर निकलता है तब भी वह कुछ नया देने की कोशिश करता है।
सो जब हम अपने शौचालय से बाहर निकले तो ख़याल आया कि क्यों न अपने पाठकों को हम अपना शौचालय दिखा दें ?
हरा-भरा मंज़र देखकर उनकी भी तबियत हरी-भरी हो जाएगी। गर्मी के मौसम में हरियाली देखकर उन्हें सुकून भी मिलेगा।
यह सोचकर ख़ास आपके लिए हमने कुछ फ़ोटो लिए और अब उन्हें आपके सामने पेश किया जाता है। देखकर बताइये कि आपको हमारे शौचालय की लोकेशन कैसी लगी ?
शौचालय, जो कि पिछवाड़े बना हुआ है.
पपीते का पेड़ 
लौकी या तोरी की बेल 
अमरुद का पेड़ 
हरे टमाटर से भरी हुई शाख़
कुछ कुछ सुर्ख हो चले टमाटर 
पेड़ों के पीछे छिपा हुआ हमारा शौचालय 

आपको हम यह भी बताते चलें कि यहां एक ही छत के नीचे तीन शौचालय बने हुए हैं, जिन्हें हम सिर्फ़ दिन में ही इस्तेमाल करते हैं। रात में वे शौचालय काम में आते हैं जो कि घर के अंदर बने हुए हैं।
बहरहाल बड़े ब्लॉगर्स की अदाएं निराली होती हैं।
अगर आप बड़ा ब्लॉगर बनना चाहते हैं तो आपको भी अपने अंदर इतना निरालापन ज़रूर लाना होगा कि अगर आप अपने शौचालय के बारे में भी बताएं तो इतने लोग उसे भी चाव से पढने आयें कि वह हॉट लिस्ट में पहुंच जाए।

और अधिक फ़ोटो आपको यहाँ मिलेंगे 

Saturday, April 30, 2011

'टेढ़ा है पर मेरा है' की भावना से ओत-प्रोत होते हैं बड़े ब्लॉगर

(पिछले सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए , गतांक से आगे )
(कृपया पिछले अंक  भी देखिये नीचे)

1- अगर किसी को बड़ा ब्लॉगर बनना है तो क्या उसे औरत की अक्ल से सोचना चाहिए ? Hindi Blogging
2- कैसा होता है एक बड़े ब्लॉगर का वैवाहिक जीवन ? Family Life

3- हरेक बड़ा ब्लॉगर जानता है कि ‘उसका सम्मान उसके गन्ने से है।‘ Ganna

4- एक बड़ा ब्लॉगर शौच कैसे करता है ? Charity begins from toilet.


'टेढ़ा है पर मेरा है' यह रहस्य भी हम पर शौचासन में ही प्रकट हुआ। हमने तो इसका मात्र सत्यापन ही किया है लेकिन जिस पर यह रहस्य पहली बार प्रकट हुआ होगा तो उस पर भी यह शौचासन में ही प्रकट हुआ होगा। यह सिद्धांत एक ब्लॉगर के दिल को पूरी तरह बदल कर रख देता है। हमारे दिल में तुरंत खयाल आया कि जब हम अपने टेढ़े वुजूद से प्यार करते हैं और इसकी भावनाओं का भी खयाल रखते हैं तो फिर अगर किसी ब्लॉगर में कोई कमी या कोई टेढ़ापन मौजूद है तो हम उससे प्यार क्यों नहीं कर सकते ?
इस खयाल के आते ही हमने दो नामी ब्लॉगर्स को लोहे के चने नाकों चबाने का ख़याल तुरंत ही छोड़ दिया ।
हमारा मन भी तुरंत हल्का हो गया ।
इट मीन्स हम शौचासन को उसके उच्चतम सोपान तक सिद्ध करने में सफल हो चुके थे ।
हक़ीक़त यह है कि धड़ेबंदियों के पीछे भी यही भावना काम करती है और इसका इलाज भी इसी तरीक़े से होगा, बिल्कुल होम्योपैथी के उसूल पर ।
भावना दूषित हो और मक़सद नाजायज़ हो तो समस्या जन्म लेती है और अगर भाव शुद्ध हो और लोक मंगल की भावना हो तो फिर समस्याओं का अंत हो जाता है । बड़ा ब्लॉगर वह होता है जो कि समस्याओं को हल करता है न कि वह जो कि नित नई समस्याएँ खड़ी करता है । आप क्या कर रहे हैं ?
यह देखना आपका काम है और अपना तो मैं देख ही रहा हूँ और आपको बता भी रहा हूँ कि टेढ़ा है पर मेरा है हरेक ब्लॉगर ।
और समाधान इसके सिवा कुछ और है भी तो नहीं और अगर हो तो आप बताएं ।
                                                                       (...जारी, आप पढ़ते रहिये जनाब)

Wednesday, April 27, 2011

‘शौचासन‘ के लाभ कैसे उठायें बड़े ब्लॉगर्स ? Self realization in the toilet

अगर हम ढंग से शौच करना ही सीख लें तो हमारी मां और बहनों की आर्थिक स्थिति ठीक हो जाएगी, मां अपने घर में और बहनें अपनी ससुराल में खुश ही रहेंगी। हमें शौच करना भी आज तक ढंग से नहीं आया इसीलिए आज मां अपने घर में ही उपेक्षित है और बहनें अपनी ससुराल में भाई की राह तक रही हैं और कभी वे मायके आ भी जाती हैं तो उन्हें यही अहसास बार बार दिलाया जाता है कि ब्याह के बाद अब तेरा यहां कुछ नहीं है। यह एक बुराई है जो हर घर में आम है। कमज़ोर का हक़ मारकर कोई समाज कभी खुशहाल नहीं हो सकता। लिहाज़ा हम भी आज तक खुशहाल न हो पाए। आज हमारे समाज में कन्या को गर्भ में ही मार दिया जाता है और जिन्हें मार नहीं पाते तो उनकी ज़िंदगी मरने से बदतर कर दी जाती है।
बदन की पाकी के साथ दिल को भी पाक करना चाहिए। जितनी देर में हमने किचन गार्डन पार किया उतनी ही देर में यह सब ख़याल तेज़ी से आकर चले गए। हम शौचालय में दाखि़ल होकर ‘शौचासन‘ में बैठ गए। यह आसन मन को बड़ा प्रफुल्लित करता है। इसे बच्चे से लेकर बूढ़ा तक हरेक कर सकता है, यहां तक कि किसी भी रोग का रोगी और गर्भवती स्त्रियां भी निःशंक होकर इस आसन को कर सकती हैं।
इस आसन के प्रमुख लाभ यह हैं कि इससे शरीर का मल निष्कासित होता है। एकाग्रता सहज उपलब्ध हो जाती है। एकाग्रता की सिद्धि होते ही प्राचीन स्मृतियां प्रकट हो जाती हैं या फिर अगर आप किसी समस्या का समाधान ढूंढ रहे हैं तो आपको उस समस्या का समाधान या तो इसी आसन में मिल जाएगा वर्ना तो इससे फ़ारिग़ होते ही मिल जाएगा।
आर्किमिडीज़ के बारे में मशहूर है कि जैसे ही वह नहाने के लिए टब में बैठा तो उसे ‘उत्प्लावन का सिद्धांत‘ सुझाई दिया। यह भी शौचासन का ही कमाल है क्योंकि वह टब में बैठने से पहले शौच करके ही फ़ारिग़ हुआ था। बहरहाल जो जिस मैदान का माहिर है, उसी मैदान की बातें उस पर खुलती हैं। हम भी इस आसन में बैठे तो हम अचानक ही ‘हो हो‘ करके हंसने लगे और हम जितना हंसते थे, उसकी वजह से हमारे पेट पर उतना ही ज़्यादा दबाव पड़ता था। जिससे समय की बचत हो रही थी और काम फ़ास्ट हो रहा था। हम जानबूझकर नहीं हंस रहे थे बल्कि हंसी हमें खुद ही आकर चिपट गई थी।
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Tuesday, April 26, 2011

एक बड़ा ब्लॉगर शौच कैसे करता है ? Charity begins from toilet.


(पिछले सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए , गतांक से आगे )
1- अगर किसी को बड़ा ब्लॉगर बनना है तो क्या उसे औरत की अक्ल से सोचना चाहिए ? Hindi Blogging
2- कैसा होता है एक बड़े ब्लॉगर का वैवाहिक जीवन ? Family Life

3- हरेक बड़ा ब्लॉगर जानता है कि ‘उसका सम्मान उसके गन्ने से है।‘ Ganna
‘मेरा सम्मान मेरे गन्ने से है‘
यह क्यों कहा गया है ?
क्या इसलिए कि गन्ना बड़ा है और कद्दू-केला और बैंगन-खीरा छोटे हैं ?
क्या फ़सलों में भी ब्लॉगर्स की तरह छोटे-बड़े का भेदभाव चलता है ?
हम पर्चा पढ़ते हुए अलग अलग कोण से सोच ही रहे थे कि बात साफ़ हो गई। दरअस्ल शुगर मिल का मक़सद गन्ने की उम्दा नस्ल को ज़्यादा से ज़्यादा पैदा करने के लिए किसानों को प्रेरणा देना था। पर्चा शुगर मिल की तरफ़ से छपा था तो लिख दिया कि किसान का सम्मान उसके गन्ने से है। आलू-टमाटर ख़रीदने वाला लिखवाता कि किसान का सम्मान आलू-टमाटर से है। दूध की डेयरी वाला लिखवाता कि किसान का सम्मान उसके दूध से है और पौल्ट्री फ़ार्म वाला लिखवाता कि आपका सम्मान आपके अंडों से है। गन्ने से लेकर अंडों तक जो भी उत्पादन है वह अपने उत्पादनकर्ता का सम्मान बढ़ाता है। इस पर्चे का सार यही है। एक किसान के लिए जो हैसियत गन्ने की है , एक ब्लॉगर के लिए वही हैसियत उसकी पोस्ट्स की है। किसान बीज बोकर गन्ना उगाता है जबकि ब्लॉगर शब्दों के बीज बोकर पोस्ट की खेती करता है। किसान ओल्ड मॉडल का ब्लॉगर है जबकि ब्लॉगर नये स्टाइल का किसान है। अच्छा गन्ना किसान को सम्मान दिलाता है तो अच्छी पोस्ट ब्लॉगर को सम्मान दिलाती है।
बात अब बिल्कुल आईने की तरह साफ़ हो चुकी थी।
हरेक बड़ा ब्लॉगर जानता है कि हरेक ब्लॉगर का सम्मान उसके गन्ने अर्थात उसकी पोस्ट्स की गुणवत्ता के समानुपाती होता है। सम्मान पाने का जज़्बा ही उसे अच्छी से अच्छी पोस्ट लिखने के लिए प्रेरित करता है। ऐसे में अगर कम अच्छी पोस्ट लिखने वाले को सम्मानित कर दिया जाए तो उन ब्लॉगर्स का हौसला पस्त हो जाएगा जो तरह तरह के कष्ट झेलकर हिंदी ब्लॉग जगत को बेहतरीन पोस्ट दे रहे हैं। उन्हें इसलिए नज़रअंदाज़ कर देना ठीक नहीं है कि वे गुटबाज़ नहीं हैं या वे ईनामदान देने वालों को वाहवाही भरी टिप्पणियां नहीं दे पाते। यह कोई जुर्म नहीं है कि इसके लिए उन्हें ईनाम से ही वंचित कर दिया जाए।

चलिए एक पहेली तो हल हुई। दिमाग़ हल्का हुआ तो पेट ने भी हल्का होने की ख्वाहिश ज़ाहिर की। लिहाज़ा हम अपने किचन गार्डन की तरफ़ चल दिए। एक शौचालय यहां भी बना हुआ है। यहां पूरी तरह प्राइवेसी है। दरअस्ल हम बचपन से ही योगी स्वभाव के आदमी हैं।
योग की सबसे अच्छी शिक्षक ‘मां‘ होती है। योग में सबसे पहले शौच और आसन की सिद्धि करनी अनिवार्य है। अगर मनुष्य यम-नियम का पाबंद नहीं है, उसका अंतःकरण पवित्र नहीं है, वह धैर्यपूर्वक एक आसन में स्थिर नहीं हो सकता तो उसे योग की सिद्धि कभी हो ही नहीं सकती। वह मां ही तो है जो बच्चे को सबसे पहले पॉटी करना सिखाती है, उसे पॉटी के लिए बैठना सिखाती है, उसे पवित्र रहना सिखाती है। योग की प्राथमिक शिक्षा यहीं से शुरू हो जाती है। हरेक इंसान का पहला गुरू उसकी मां होती है। इंसान बड़ा होता है तो उसे अपना अभ्यास भी बढ़ा देना चाहिए। अब उसे कोशिश करनी चाहिए कि शरीर की तरह उसके मन में भी गंदे विचार जमा न होने पाएं। लेकिन इंसान अपने मन को निर्मल बनाने पर ध्यान ही नहीं देता। हम जब भी शौच के लिए जाएं तभी हम अपने मन को भी बुरे विचारों से पाक करने की कोशिश करें। इस तरह एक ही समय में हमें दो लाभ हो सकते हैं। इस समय शरीर खुद को साफ़ करने में जितना समय लेता है, उतने समय में हम कोई और काम तो कर ही नहीं सकते। लिहाज़ा उतने समय में हमें अपने मन को ही टटोल लेना चाहिए कि हमारे मन में कोई बुरा विचार तो नहीं आ गया है। हम नाहक़ किसी को सता तो नहीं रहे हैं ?
किसी का कोई हक़ तो हमने नहीं मार लिया है ?    
अगर हम ढंग से शौच करना ही सीख लें तो हमारी मां और बहनों की आर्थिक स्थिति ठीक हो जाएगी, मां अपने घर में और बहनें अपनी ससुराल में खुश ही रहेंगी। हमें शौच करना भी आज तक ढंग से नहीं आया इसीलिए आज मां अपने घर में ही उपेक्षित है और बहनें अपनी ससुराल में भाई की राह तक रही हैं और कभी वे मायके आ भी जाती हैं तो उन्हें यही अहसास बार बार दिलाया जाता है कि ब्याह के बाद अब तेरा यहां कुछ नहीं है। यह एक बुराई है जो हर घर में आम है। कमज़ोर का हक़ मारकर कोई समाज कभी खुशहाल नहीं हो सकता। लिहाज़ा हम भी आज तक खुशहाल न हो पाए। आज हमारे समाज में कन्या को गर्भ में ही मार दिया जाता है और जिन्हें मार नहीं पाते तो उनकी ज़िंदगी मरने से बदतर कर दी जाती है।
बदन की पाकी के साथ दिल को भी पाक करना चाहिए। जितनी देर में हमने किचन गार्डन पार किया उतनी ही देर में यह सब ख़याल तेज़ी से आकर चले गए। हम शौचालय में दाखि़ल होकर ‘शौचासन‘ में बैठ गए। यह आसन मन को बड़ा प्रफुल्लित करता है। इसे बच्चे से लेकर बूढ़ा तक हरेक कर सकता है, यहां तक कि किसी भी रोग का रोगी और गर्भवती स्त्रियां भी निःशंक होकर इस आसन को कर सकती हैं।
इस आसन के प्रमुख लाभ यह हैं कि इससे शरीर का मल निष्कासित होता है। एकाग्रता सहज उपलब्ध हो जाती है। एकाग्रता की सिद्धि होते ही प्राचीन स्मृतियां प्रकट हो जाती हैं या फिर अगर आप किसी समस्या का समाधान ढूंढ रहे हैं तो आपको उस समस्या का समाधान या तो इसी आसन में मिल जाएगा वर्ना तो इससे फ़ारिग़ होते ही मिल जाएगा।
आर्किमिडीज़ के बारे में मशहूर है कि जैसे ही वह नहाने के लिए टब में बैठा तो उसे ‘उत्प्लावन का सिद्धांत‘ सुझाई दिया। यह भी शौचासन का ही कमाल है क्योंकि वह टब में बैठने से पहले शौच करके ही फ़ारिग़ हुआ था। बहरहाल जो जिस मैदान का माहिर है, उसी मैदान की बातें उस पर खुलती हैं। हम भी इस आसन में बैठे तो हम अचानक ही ‘हो हो‘ करके हंसने लगे और हम जितना हंसते थे, उसकी वजह से हमारे पेट पर उतना ही ज़्यादा दबाव पड़ता था। जिससे समय की बचत हो रही थी और काम फ़ास्ट हो रहा था। हम जानबूझकर नहीं हंस रहे थे बल्कि हंसी हमें खुद ही आकर चिपट गई थी।
एक बड़ा ब्लॉगर हर समय ब्लॉग और ब्लॉगर्स के बारे में ही सोचता रहता है। जाने कैसे हमें डा. डंडा लखनवी का ख़याल आ गया। जब उन्होंने पहली बार मेरे ब्लॉग ‘इस्लाम धर्म‘ पर बेमेल टिप्पणी तो मुझे एक चिढ़ सी पैदा हुई। वह हमारी पोस्ट पर अपनी पोस्ट का बड़ा प्रचार कर गए थे। उनकी यह टिप्पणी बिल्कुल बेजा थी। फिर हमने देखा कि उनका नाम तो और भी ज़्यादा बेमेल है। हम बचपन से ही अपने वालिद साहब और अपने उस्तादों के डंडे खाते आए हैं। अब जाकर उनसे मुक्ति मिली थी कि ये साहब फिर से डंडे की याद दिलाने चले आए।
क्या इन साहब को कोई और नाम नहीं मिला था रखने के लिए ?
बहरहाल हमारे पल्ले नहीं पड़ा कि उन्होंने क्या सोचकर यह नाम रखा ?
बस आज मन में दबे हुए इसी सवाल को हल होना था। अचानक हमारे दिल पर यह इन्कशाफ़ हुआ कि उन्होंने अपना नाम डंडा क्या सोचकर रखा ?
और यह भी संभव है कि उन्हें अपना नाम ‘डंडा‘ रखने का विचार भी शौचालय में ही आया हो।
हम बेफ़िक्री से हंसते रहे, हमें पता था कि अंदर की आवाज़ को सुनने वाला यहां कोई भी नहीं है। आदमी जब तन्हा होता है तो वह खुद से मिलता है। जब वह खुद से मिलता है तभी वह जान पाता है कि वास्तव में वह क्या है ?
शौचालय में शौचासन के ज़रिये आदमी को आत्मसाक्षात्कार होता है लेकिन दुख की बात है कि वह उस समय जागरूक नहीं होता।
जो आदमी जागरूक होकर शौच तक नहीं कर सकते वे ब्लॉग पर भी अपना शौच साथ ही ले आते हैं। यहां वे अपने मन की गंदगी के ढेर लगा देते हैं। जिन्होंने अपनी सगी बहनों को अपने बाप की जायदाद में हिस्सा नहीं दिया, वे पराये पेट से पैदा हिंदी ब्लॉगर्स को उनका जायज़ हक़ भला कैसे दे पाएंगे ?
अपने दिलो-दिमाग़ में जो गंदगी के ढेर उठाए फिर रहे हैं, वे चाहते हैं कि उन्हें सम्मानित हिंदी ब्लॉगर्स अपने सिरों पर उठा लें।
उन्हें उठाएंगे उन्हीं जैसे ब्लॉगर्स, हम भला बेईमानों को अपने सिरों पर क्यों बिठाएंगे।
ज़्यादा हुआ तो हम इन्हें शौचालय में तो बिठा सकते हैं कि पहले ढंग से ‘पॉटी‘ करना सीख लीजिए, ढंग के ब्लॉगर्स से सम्मान पाने की बात बाद में सोचना और तब ही तुम किसी का सम्मान करना सीख पाओगे। फ़िलहाल तो तुम सम्मान के बजाय राजनीति कर रहे हो और राजनीति भी गंदी कर रहे हो।
बहरहाल जब हम फ़ारिग़ होकर बाहर निकले तो एक पोस्ट का मसाला तैयार हो चुका था। हमारी यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स के सामने अब यह हक़ीक़त पूरी तरह आ चुकी है कि एक बड़ा ब्लॉगर शौच कैसे करता है ?
क्या शौच करने का इससे बेहतर कोई और तरीक़ा मुमकिन है ?

Monday, April 25, 2011

हरेक बड़ा ब्लॉगर जानता है कि ‘उसका सम्मान उसके गन्ने से है।‘ Ganna

(पिछले सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए , गतांक से आगे )
1- अगर किसी को बड़ा ब्लॉगर बनना है तो क्या उसे औरत की अक्ल से सोचना चाहिए ? Hindi Blogging
2- कैसा होता है एक बड़े ब्लॉगर का वैवाहिक जीवन ? Family Life

आदमी की हक़ीक़त उसकी औरत ही जानती है और आदमी को भी अपनी हक़ीक़त तभी पता चलती है जबकि वह अपनी औरत का सामना करता है। औरत की ज़बान ही नहीं बल्कि उसकी अक्ल भी तेज़ चलती है। वह बदन से ज़रूर कमज़ोर होती है लेकिन फिर भी अपने मर्द पर वह भारी पड़ती है। बदन से भी उसे कमज़ोर रखा है उस बनाने वाले ने तो यह मर्दों पर उस मालिक का एक बड़ा अहसान है। अगर वह बदन से कमज़ोर न होती तो आज हरेक घर में कुश्ती चल रही होती और मर्द अपने हाथ-पैर और मुंह तुड़ाए बैठा होता। मालिक ने औरत को एक चीज़ में कम रखा तो उसे दूसरी चीज़ में बढ़ा दिया, उसे मां बना दिया, उसके दिल में प्यार का सागर रख दिया और यह सच है कि प्यार की दौलत के सामने बदन की ताक़त का दर्जा कम है। मालिक कम चीज़ लेता है तो ज़्यादा चीज़ देता है, हमेशा उसका उसूल यही है। मर्द इस राज़ को समझता तो अपनी ताक़त से वह औरत को फ़ायदा पहुंचाता और प्यार का जो ख़ज़ाना उसके पास है, उससे वह फ़ायदा उठाता। बहुत सी किताबें पढ़कर और नेक वलियों की सोहबत में बैठकर हमने यही जाना है। आदमी के लिए उसकी शरीके-हयात से अच्छा दोस्त, हमदर्द, मददगार और राज़दार दूसरा कोई होता ही नहीं। जब हम उलझन में होते हैं तो हम अपनी ख़ानम से ही काउंसिलिंग करते हैं और अल्लाह का शुक्र है कि उनकी सलाह सही होती है और काम करती है।
‘हिंदी ब्लॉगर्स सम्मेलन‘ के लिए आए निंमत्रण के बारे में भी उन्होंने जो कुछ कहा, सही कहा। हमने जान लिया कि जो भी हिंदी ब्लॉगर ख़ानदानी शरीफ़ होगा और गुटबाज़ी से दूर होगा वह तो इस सम्मेलन में जाएगा ही नहीं। हां, जिन्हें कुछ बेचना है या जिन्हें कुछ ख़रीदना है या अपने अच्छे ख़ासे-कुंवारेपन में चेंज दरकार है, वे ज़रूर इस हाट में ठाठ-बाट से पहुंचेगे और नहीं भी पहुंच पाएंगे तो इंटरनेट से ही ‘जलवों‘ का नज़ारा कर लेंगे। अभी तो शुरूआत है लेकिन आने वाले ‘सम्मान समारोहों‘ में हिंदी ब्लॉगर्स के लिए ‘चीयर लीडर्स‘ की तर्ज़ पर कुछ ‘चीयर ब्लॉगर्स‘ का भी इंतज़ाम कर लिया जाए तो हिंदी ब्लॉगिंग समय के साथ क़दम मिलाकर चलने लगेगी।
हम यह सब सोच ही रहे थे कि तभी कॉल बेल बजी। किसान और मज़दूर का दरवाज़ा आज भी हातिम ताई के दिल की तरह हमेशा खुला ही रहता है। हमने खुले-खुलाए दरवाज़े के पार ‘शुगर मिल‘ की तरफ़ से गन्ने की पर्ची लाने वाले हरकारे को देखा। पास जाकर उससे पर्ची ली तो उसने एक पम्फ़लैट भी हमारे हाथ में थमा दिया। जिसमें गन्ने की अच्छी नस्लों के बीज के बारे में जानकारी दे रखी थी और सबसे ऊपर मोटे मोटे हरफ़ों में लिखा हुआ था कि
‘मेरा सम्मान मेरे गन्ने से है‘
हम ताज्जुब में पड़ गए कि हमारे खेत में तो केला, लौकी और कद्दू भी होता है, बैंगन और खीरा भी होता है और जब हम इन्हें आढ़त में लेकर जाते हैं तो हरेक आढ़ती हमें सम्मान देता है और जब उससे रक़म लेकर वापस आते हैं तो जो भी मिलता है, वह भी हमें सम्मान देता है। इसके बावजूद आज तक किसी ने न कहा कि मेरा सम्मान मेरे खीरे-बैंगन से है या मेरा सम्मान मेरे केले से है।
हरकारा तो हमारे हाथ में पर्ची और पर्चा थमाकर चला गया और हम अपनी चैखट पर खड़े यही सोचते रहे कि आखि़र यह क्यों कहा गया कि ‘मेरा सम्मान मेरे गन्ने से है।‘
सोचते-सोचते अचानक हम पर राज़ खुला कि ऐसा क्यों कहा गया है ?
हक़ीक़त यह है कि हरेक बड़ा ब्लॉगर जानता है कि ‘उसका सम्मान उसके गन्ने से है।‘ (...जारी)

Saturday, April 23, 2011

कैसा होता है एक बड़े ब्लॉगर का वैवाहिक जीवन ? Family Life


हमने अपनी शरीके-हयात को बताया-‘ख़ानम ! महीने की आखि़री तारीख़ को हिंदी ब्लॉगर्स का एक सम्मेलन हो रहा है।‘
‘तो‘-उन्होंने अपनी रसोई से ही दरयाफ़्त दिया।
अब हमें अपनी स्टडी से निकलकर उनकी रियासत के मरकज़ में यानि कि किचन में जाना पड़ा।
‘भई, तो से क्या मतलब ?, सम्मेलन हो रहा है ब्लॉगर्स का।‘-हमने जैसे ही कहा तो उन्होंने अपने हाथ के मसाले मिक्सी में डालकर मिक्सी फ़ुल स्पीड पर ऐसी चलाई कि तमाम टमाटर लहू-लुहान होकर रह गए। हमने शुक्र मनाया कि हम टमाटर की योनि में नहीं जन्मे वर्ना आज पीसकर रख दिए गए होते। तमाम मर्दों की तरह हम भी अपने दिल ही दिल में अपनी ख़ानम से डरे हुए से रहते हैं लेकिन बाहर से उन पर दूसरों की तरह हम भी कभी अपने दिल की हक़ीक़त ज़ाहिर नहीं होने देते। आज मर्दों के पास बस एक यह भ्रम ही तो बचा हुआ है मर्दानगी का कि हम तोप हैं वर्ना तो आज कौन सा काम ऐसा है जिसे औरत नहीं कर रही है या कर नहीं सकती और वह भी मर्द से बेहतर। यहां तक कि हिंदी ब्लॉगिंग भी औरतें ही कर रही हैं मर्दों से बेहतर। मर्द क्या कर रहा है ?
औरत की आबरू तार-तार कर रहा है, उसे नंगा कर रहा है।
छिनाल छिपकली डॉट कॉम वाले भाई विशाल ‘वनस्पति‘ जी के नाम से तो ऐसा लगता है मानों वे पुरातन भारतीय संस्कृति के कोई बहुत बड़े प्रहरी हों लेकिन जब हमने उनकी ‘छिनाल छिपकली‘ वाली पोस्ट देखी तो हम शर्म के मारे भाग आए वहां से बिना टिप्पणी किए ही। भाई विशाल ने वहां एक औरत की बिल्कुल नंगी फ़ोटो लगा रखी थी जो कि उन्होंने अपनी पत्नी या बहन की तो बिल्कुल भी नहीं लगाई होगी। जब वे अपनी पत्नी और बहन की मादरज़ाद नंगी फ़ोटो नहीं लगा सकते तो फिर उन्होंने किसी और की बीवी और बहन की फ़ोटो ही क्यों लगाई अपनी पोस्ट पर ?
हया-ग़ैरत का कुछ पता नहीं और दावा यह है कि ‘अभिव्यक्ति की नई क्रांति‘ पर होल्ड हमारा होना चाहिए।
उनसे भी ज़्यादा बेग़ैरत वे औरतें हैं जो उस पोस्ट पर विराजी हुई वाह-वाह कर रही हैं। बाद में एक बूढ़ी तजर्बेकारा ने उनके कान खींचे तो उन्होंने किसी की बहन की वह नंगी फ़ोटो वहां से हटाई। इसीलिए कहते हैं कि पुराना चावल पुराना ही होता है।
ख़ैर, टमाटर पर अपना गुस्सा निकालने के बाद हमारी ख़ानम चावल धोने लगीं और जब वे पानी के संपर्क में आईं तो उनका टेम्प्रेचर कुछ कम हुआ। हमने फिर कहा-‘हमें हिंदी ब्लॉगर्स के इस भव्य सम्मेलन में बुलाया जा रहा है विद फ़ैमिली। सो आप चिंटू-पिंटू, नन्हीं और मुन्नी को तैयार कर देना और खुद भी तैयार रहना।‘
उन्होंने पूछा-’क्या मतलब ?‘
‘अरे भई, क्या हर बात खोलकर ही कहनी पड़ेगी ? आप एक गृहस्थन हैं, थोड़ा समझा कीजिए। दावत वाले दिन बच्चों को सुबह नाश्ता मत दीजिएगा, बस चाय पिला दीजिएगा और दोपहर को हल्का फुल्का सा ही दीजिएगा ताकि रात को हमारे मेज़बान को कोई शिकायत न हो कि उनका खाना बचकर बेकार गया।‘-हमने अपनी हिकमत बयान की तो वे भड़क पडीं-‘आपने इतनी बेहूदा बात सोची भी कैसे ?, क्या हम मुफ़्तख़ोर हैं ?‘
‘अरे भई, हमने नहीं सोची बल्कि यह ब्लॉगर सम्मेलन का आम रिवाज है, वहां सभी ऐसे ही तैयारी से आते हैं।‘-हमने बताया।
‘आपकी ख़ानदानी शराफ़त और ग़ैरत को दिन-ब-दिन आखि़र होता क्या जा रहा है ?‘-उन्होंने अपनी हैरत का इज़्हार किया।
‘क्यों क्या हुआ हमारी शराफ़त को ?‘-अब हम सचमुच ही भन्ना गए थे।
‘जबसे ब्लॉगिंग शुरू की है तब से आपकी कोई चूड़ी टूटी हमसे ?‘-हमने भी अपनी शराफ़त का सुबूत पेश कर दिया।
‘हमने चूड़ियां ही पहननी छोड़ दीं जबसे आपने यह निगोड़ी ब्लॉगिंग शुरू की है। इसने तो सुहागन और बेवा का ही फ़र्क़ मिटाकर रख दिया है। जब कोई देखने वाला ही नहीं तो क्या करें हम बन-संवर कर ?‘-उनके तो आंसू निकल पड़े। आप रोने वाले से नहीं लड़ सकते। औरत की सारी ताक़त उसकी आंखों में है। यहां शोला भी है और शबनम भी। उन्हें रोते हुए अगर हमारे बच्चों ने देख लिया तो बच्चे भी हमसे नफ़रत करने लगेंगे, सोचेंगे कि ज़रूर हमारी अम्मी जान को मारा होगा। हम उनकी मिन्नत समाजत करने लगे और अब जो हमने उनके चेहरे को ग़ौर से देखा तो वाक़ई दुख सा हुआ। उनका चेहरा विधवा का सा ही लग रहा था। तभी हमें ख़याल आया कि अगर सरकार देश की जनसंख्या पर सचमुच क़ाबू पाना चाहती है तो उसे ब्लॉगिंग को बढ़ावा देना चाहिए। क्या मजाल अगर कोई शौहर अपनी बीवी के पास फटक भी जाए।
‘देखिए, आप हमारी शराफ़त पर सवाल उठा रही थीं लेकिन क्या यह आपकी शराफ़त की बात है कि दिन में ही रो रही हैं ? क्या आप हमारे बच्चों को हमसे बदगुमान करना चाहती हैं ?‘-उन्हें चुप करने का हथकंडा हमें पता था और सचमुच वह चुप हो भी गईं। औरतों को अपनी परेशानी का इतना ख़याल नहीं होता जितना ख़याल वे अपने नालायक़ से शौहरों की इज़्ज़त का रखती हैं।
‘शरीफ़ हूं तभी आपके घर में दिन काट रही हूं और आपके बच्चे पाल रही हूं। ख़ैर आप बताएं कि आपका मसअला अस्ल में है क्या ?‘-अब वह बात करने के मूड में आ गई थीं।
‘भई, खाने की दावत है, बुलावा आया है, मुख़तसर कहानी तो यह है।‘-हमने शॉर्टकट मारना ही मुनासिब समझा।
‘आपके पास कोई कॉल आई है क्या ?‘-उन्होंने पूछा।
‘नहीं तो, सपना समूह वालों की तरफ़ से हमें एक दावतनामा मिला है ईमेल के ज़रिये।‘-हमने कहा।
‘बस ?‘-उन्होंने बस पर बहुत ज़्यादा ज़ोर दिया तो हम खटक गए।
‘तो क्या किसी कबूतर को संदेसा लाना चाहिए था?‘-हम झुंझला से गए।
‘क्या उन लोगों के पास आपका मोबाइल नंबर नहीं है ?‘-उन्होंने पूछा।
‘है क्यों नहीं, बिल्कुल है। अभी तो हमने विशाल ‘वनस्पति‘ जी को खुद दिया था चैट पर‘-हमने कहा।
‘इसके बावजूद भी उन्होंने आपको कॉल नहीं की। इसका मतलब समझे आप ?‘-उन्होंने हमसे पूछा।
‘नहीं तो।‘-हमें अपनी अक्ल पर रोने को जी चाह रहा था।
‘वे चाहते ही नहीं हैं कि आप उनके प्रोग्राम में आएं। अगर वे आपको दिल से बुलाने के ख्वाहिशमंद होते तो वे आपको कॉल ज़रूर करते।‘-उनकी बात में दम था।
‘अगर उन्हें हमें बुलाना ही नहीं है तो फिर उन्होंने हमें इन्विटेशन कार्ड क्यों भेजा ?‘-हमने मासूमियत से पूछा।
‘ताकि वे आपको अपनी शान दिखा सकें कि देखो हम कित्ता बड़ा प्रोग्राम कर रहे हैं। आपमें दम है तो आप इससे बड़ा प्रोग्राम करके दिखाएं।‘-उन्होंने कहा और हमारे दिल को भी लगा।
‘जब आप हमें ब्याहने आए थे तो जिन लोगों को आप अपने निकाह में मौजूद देखना चाहते थे, उन्हें आपने कार्ड भी भेजा, कॉल भी किया और उन्हें कार भी करके दी ताकि वे आने से रह न जाएं।‘
‘हां, यह तो है।‘-हमने कहा।
‘इस प्रोग्राम में भी मुन्तज़िमीन जिन्हें बुलाना चाहते हैं उन्हें कार्ड के साथ कॉल भी ज़रूर की होगी और उनके लिए कन्वेंस का इंतज़ाम भी किया होगा।‘-उन्होंने केस पूरी तरह सॉल्व कर दिया था।
‘इसका मतलब तो यह है कि इस प्रोग्राम में सिर्फ़ ईनाम ही नहीं बल्कि मेहमान भी फ़िक्स हैं। घोटाला दर घोटाला‘-हम कुछ सोचते हुए से बुदबुदाए।
‘और नहीं तो क्या ?‘-अपनी दानिश्वरी साबित होते देखकर अब उनके होंठों पर मुस्कुराहट तैरने लगी थी।
‘तो निमंत्रण भेजने का मक़सद आजकल बुलाना नहीं होता बल्कि अपनी शेख़ी बघारना होता है।‘
‘जी हां।‘-उन्होंने बड़े फ़ख्र से कहा। अपने हाथ से एक उम्दा सी दावत निकलते देखकर हमारा दिल बहुत फड़फड़ा रहा था।
‘लेकिन कुछ ब्लॉगर्स तो मात्र इन्वीटेशन कार्ड पाकर ही पहुंच जाएंगे सम्मेलन में।‘-हमने अपना अंदेशा ज़ाहिर किया।
‘सिर्फ़ वे ब्लॉगर्स जाएंगे जिनके बीवी नहीं होगी या होगी तो उससे वे पूछेंगे नहीं।‘-उन्होंने कहा।
‘वे वहां क्यों जाएंगे ?‘
‘जिस मक़सद से वहां लड़कियां आएंगी। जानते हो आजकल रिश्ते मिलना कितना मुश्किल हो रहा है ?‘-उन्होंने एक और क्ल्यू दिया।
‘तो जो लोग आएंगे, उन्हें भी ‘हिंदी ब्लॉगिंग का आगा-पीछा‘ जानने में कोई दिलचस्पी न होगी।‘-हमारी हैरत बढ़ती ही जा रही थी।
‘हर आदमी आज तरह-तरह के मसाएल से घिरा हुआ है, उसे सिर्फ़ अपने मसाएल का हल चाहिए। वह जहां भी जाता है अपने मसाएल के हल के लिए जाता है या फिर ...।‘-उन्होंने मुस्कुराकर बात अधूरी छोड़ दी। उनका विधवापन हल्के-हल्के दूर होता जा रहा था। लग रहा था कि आज ज़रूर कुछ होकर रहेगा, बहुत दिनों बाद।
‘या फिर...।‘-लेकिन हम भी हातिम ताई की तरह पहले सवाल हल कर लेना चाहते थे।
‘या फिर अपने मसाएल से फ़रार इख्तियार करने के लिए, थोड़ा सा दिल बहलाने के लिए।‘
‘हां, शायद इसीलिए वहां नाच-गाने और नाटक वग़ैरह का प्रोग्राम भी रखा गया है। इसका मतलब आयोजक भी जानते हैं कि हमारी किताब और हमारी परिचर्चा से लोगों को बोरियत होगी ?‘-हमें हैरत का एक और झटका लगा।
‘लेकिन लोग बोर होंगे नहीं।‘-उन्होंने फिर एक और चोट कर डाली।
‘क्यों भला ?‘
‘कुछ अपनी अक्ल पर भी तो ज़ोर डालिए न। बस बहुत हो गई बातें। हमें खाना तैयार करने दीजिए। बच्चे अब स्कूल से आते ही होंगे। आप खुद तो किसी काम के अब बचे नहीं हैं। हमें तो अपने बच्चे देखने दीजिए।
हम समझ रहे थे कि वह क्या कह रही हैं और क्या चाह रही हैं लेकिन हम सचमुच ही कुछ कर पाने की हालत में नहीं रह गए थे। यह ब्लॉगिंग अंदर तक से खोखला कर देती है। ग़ैरत के साथ-साथ यह ताक़त को भी चाट जाती है।
‘अंदर से खोखले लोगों का सम्मेलन बाहर से कितना भव्य लगेगा ?‘-हम मन ही मन में सोच रहे थे। काश हमें उन दोनों में से कोई फ़ोन ही कर लेता तो कम से कम अपने परिजनों को साथ ले जाने का हमारा मुंह तो हो जाता।  (...जारी)

Friday, April 22, 2011

अगर किसी को बड़ा ब्लॉगर बनना है तो क्या उसे औरत की अक्ल से सोचना चाहिए ? Hindi Blogging

हमारी क्लास के प्यारे छात्रों और छत्र-धारिकाओं ! आज हम आपको बताएंगे कि जो लोग यह रोना रोते हैं कि हिंदी ब्लॉगिंग में पैसा नहीं है, वे ग़लत हैं। अगर आदमी अपना ज़मीर बेच डाले तो फिर उसे किसी फ़ील्ड में भी पैसे की तंगी कभी नहीं सताती। आदमी को जो चीज़ दुखी और परेशान करती है, वह उसकी उसूलपसंदी है। संतों ने भी कहा है कि अपने दुख का कारण मनुष्य स्वयं ही है। सभी संत किसी न किसी उसूल के पाबंद थे सो वे सदा दुखी ही रहे।
एक सत्य घटना के माध्यम से आप यह बात अच्छी तरह जान लेंगे। यह घटना एक ऐसी जगह की है, जिसका नाम बताने से कोई नफ़ा नहीं है और यह उस समय घटी जबकि हिंदी-ब्लॉगिंग में खिलाड़ी और अनाड़ी, सभी अपने-अपने खेल खेल रहे थे। ऐसे समय में हमें एक रोज़ ईमेल से एक ‘निमंत्रण पत्र‘ मिला कि देश की राजधानी में 70 ब्लॉगर्स को सम्मानित किया जाएगा।
मैं उसे भी पढ़ता रहा और अपने मन में भी सोचता रहा तो तथ्य कुछ इस प्रकार उद्घाटित हुए कि ब्लॉगर्स को सम्मान के नाम पर शॉल और मोमेंटो दिया जाएगा, शॉल पत्नी के उलाहनों से बचने के लिए कि इस मुई ब्लॉगिंग ने तुम्हें दिया ही क्या ?
और मोमेंटो दोस्तों पर रौब ग़ालिब करने के लिए। उनका नाम  एक ऐसी किताब में भी छापा जाएगा, जिसे वे अपने नाम की ख़ातिर भारी क़ीमत पर ख़रीदने के लिए मजबूर किए जाएंगे। उनकी तंगहाली का ख़याल रखते हुए उन्हें एक लिफ़ाफ़े में इतनी रक़म भी दी जाएगी जिससे उनके आने-जाने का ख़र्चा उन पर न पड़कर ‘हास्य निवेदन‘ नामक संस्था पर पड़े, जिसकी प्लैटिनम जुबली के अवसर को यादगार बनाने के लिए यह सब गोरखधंधा फैलाया जा रहा है। इस संस्था से पूरी सौदेबाज़ी हमारे दो महान ब्लॉगर्स ने की है। जिनमें से एक हैं ‘सपना समूह‘ वाले कमल ‘सवेरा‘ जी और दूसरे हैं ‘छिनाल छिपकली डॉट कॉम‘ वाले विशाल ‘वनस्पति‘ जी।
ये सभी ब्लॉगर्स ऐसे बुद्धिजीवी हैं जिन्होंने भ्रष्टाचार के विरूद्ध अन्ना हज़ारे जी के समर्थन में पोस्टें लिखीं हैं और अब इन्हें उसी नेता बिरादरी का एक आदमी सम्मानित करेगा जिसे ये सभी लोग भ्रष्ट और आतंकवादियों से भी बदतर मानते हैं। नेताओं का आज पब्लिक के दिल में कितना सम्मान है, यह कोई ढकी-छिपी बात नहीं है। जिसका आज खुद कोई सम्मान नहीं है, वह क्या उन्हें सम्मान देगा जो कि पैदाइशी तौर पर ही सम्मानित हैं। एक ऐसा आदमी, जिसकी पूरी बिरादरी के खि़लाफ़ ही अन्ना जैसे हज़ारों सैकड़ों साल से लड़ते आ रहे हैं, वह आदमी वहां आएगा और ब्लॉगर्स को गिफ़्ट आदि देने से पहले एक ऐसी तक़रीर सुनाएगा जिसमें शुरू से आखि़र तक शब्द-छल के सिवा कुछ भी न होगा और तमाम ब्लॉगर्स बिना चूं-चपड़ उसे सुनेंगे केवल एक ईनामदार बन्ने के लालच में .  वह कहेगा कि उसकी पार्टी के राज में सब ओर रामराज्य जैसे हालात हैं। जबसे उनकी सरकार बनी है तबसे उनके प्रदेश में तो क्या, उनके आस-पास तक के प्रदेशों से भी बेईमानी और भ्रष्टाचार का जड़ सहित ख़ात्मा हो चुका है। अब कोई ऐसा मुद्दा शेष नहीं है, जिसके लिए देश की जनता को परेशान होना पड़े। सभी बड़े ठेके इस तरह दिये जा रहे हैं कि किसी को भी कोई ‘शिकायत‘ न हो। पत्रकारों का भी ‘ध्यान‘ रखा जा रहा है और अब पता चला है ‘ब्लॉगर्स‘ नाम की भी एक पूरी जमात वुजूद में आ गई है, सो लिहाज़ा अब इसका भी ‘ध्यान‘ रखा जाएगा। अभी यह पता चलाया जा रहा है कि आप लोगों का ध्यान ‘किन लोगों‘ के माध्यम से रखा जाए ?
और कैसे रखा जाए ?
मैं आभारी हूं ‘हास्य निवेदन‘ के स्वामी का, कि उन्होंने अपने ब्याज की राशि में से एक अंश आपको बुलाने और खिलाने-पिलाने पर ख़र्च करना गवारा किया। इसके एवज़ में मैं ये दो भारी-भरकम किताबें सरकारी लायब्रेरियों की अलमारी में सड़ने के लिए सैंक्शन कर दूंगा क्योंकि इन्हें जब मैं ही नहीं पढ़ूंगा तो फिर कोई और ही क्यों पढ़ेगा ?
छात्रों और छात्राओं को तो आपस में मोबाईल पर बात करने से ही फ़ुर्सत नहीं मिलती। वे अपना कोर्स तक तो पढ़ते नहीं ‘हिंदी-ब्लॉगिंग का आगा-पीछा‘ क्या पढ़ेंगे ?
और न ही लेखक यह किताब आम लोगों को पढ़वाना चाहते हैं। अगर वे इसे सभी को पढ़वाना चाहते तो वे इसे कम पृष्ठों में छापते, चाहे धारावाहिक के रूप में छापते। 20-30 रूपये की किताब हरेक ब्लॉगर ख़रीद भी लेता और अपना ‘आगा-पीछा‘ भी जान लेता। लेकिन उन्होंने यह किताब जनता के लिए थोड़े ही लिखी है, उन्होंने तो यह किताब अपना नाम ऊंचा करने के लिए और रिकॉर्ड के लिए लिखी है। या कहें कि हमारे साथ सरकारी माल पर हाथ साफ़ करने के लिए लिखी है। बहरहाल जैसी भी लिखी है, बड़ी अच्छी लिखी है। मैं इनका विमोचन करता हूं। सभी फ़ोटोग्राफ़र्स अच्छे एंगल से फ़ोटो बनाएं और खूब सजाकर अपने अख़बारों में लगाएं और ऐसे शीर्षक लगाएं जैसे कि आज हिंदी-ब्लॉगिंग को कोई बहुत बड़ा उद्धार हो रहा हो।
इसी तरह की ऐसी बहुत सी बातें, जो कि ‘लोकपाल बिल‘ से डरा हुआ नेता कभी नहीं कहेगा, मैं अपने दिल में सोचता रहा। ‘हास्य निवेदन‘ के मोटे पूंजीपति को फांसने में जिन दो लोगों ने सफलता पाई है, वे दोनों ही राजधानी में रहते हैं। एक देश की और दूसरा प्रदेश की। एक हैं कमल ‘सवेरा‘ जी और दूसरे हैं विशाल ‘वनस्पति‘ जी।
दोनों शाकाहारी हैं लेकिन मोटी आसामी हलाल करने में इन दोनों ने सारे मांसाहारियों को ही पीछे छोड़ दिया। आदमी अगर मिल-जुलकर काम करे और युक्ति से काम ले तो वह सूखे तिलों में से भी तेल निकाल सकता है। हम तो दोनों के कौशल के क़ायल होकर रह गए।
हमारा नाम ईनामख़ोरों की लिस्ट में नहीं था। उसके बावजूद एक तसल्ली थी कि इस महंगाई के ज़माने में ‘हास्य निवेदन‘ वाला सभी आगंतुकों को खाना खिलाने के लिए तैयार था ताकि एक तो वे खाने के शौक़ में अंत तक जमे रहें और दूसरे ज़ोर-ज़ोर से तालियां बजाने का उत्साह भी उनमें बना रहे, और तीसरे उन्हें अपने अपमान का अहसास कुछ कम हो जाए कि उन्हें सम्मानित क्यों नहीं किया गया ?
हमने हर चीज़ को बेक़ायदा तरीक़े से सोचा और गांधी जी को याद किया कि गांधी जी को लोग गालियों के ख़त लिखते थे तो गांधी जी ख़त को रद्दी में फेंकने से पहले टटोल लिया करते थे और अगर उसमें कोई आलपिन होती थी तो वे उसे निकाल लिया करते थे।
मुझे इस पूरे आयोजन में काम की चीज़ सिर्फ़ ‘रोटी-पानी‘ नज़र आ रही थी। इसके लिए तो बाज़ दफ़ा औरत को अपनी आबरू तक बेचनी पड़ जाती है, जबकि मुझे तो केवल अपने ज़मीर का ही सौदा करना था। लिहाज़ा मैं मन ही मन तैयार हो गया कि चलो इस आयोजन में ज़रूर चलेंगे जो कि हिंदी-ब्लॉगिंग में इन्कम के द्वार खोलने के लिए आयोजित किया जा रहा है। बुलाने वाला खाने के लिए और ताली बजाने के लिए परिजनों तक को साथ बुला रहा है।
कितनी अच्छी आसामी है ?
चलो इससे मुलाक़ात ही हो जाएगी और हो सकता है कि किसी समय यह अपना भी कबाड़ छाप डाले। हमारे पास भी सवेरा जी जैसी कई ऐसी पोस्ट हैं जिन पर ब्लॉग-जगत ने कभी दो टिप्पणी तक करना गवारा न किया। जब सवेरा जी अपनी ऐसी पोस्ट बेच भागे तो हो सकता है कि हमारे भी नसीब जाग जाएं। जिन फिल्मों को दर्शक नहीं मिलते, पता चलता है कि वे कला फ़िल्म मान ली गईं और कई अवॉर्ड ले भागी। हो सकता है कि कल ‘हास्य निवेदन‘ वाला अपनी ऊंची पहुंच के बल पर इस ‘आगा-पीछा‘ को भी कोई बड़ा पुरस्कार दिलवा डाले। क्रिकेट की तरह आज सभी कामों में फ़िक्सिंग चल रही है। ब्लॉगिंग अभी तक फ़िक्सिंग से दूर थी लेकिन भाई लोगों ने इसमें भी फ़िक्सिंग शुरू कर दी। जिससे खुश हो गए, उसे ईनामदार बना दिया और जिससे नाराज़ हो गए, उसका नाम सार्वजनिक घोषणा के बावजूद निकाल दिया। इस अन्याय और चौपट नीति के खि़लाफ़ जो भी मुंह खोलेगा, उसका भी ईनाम कैंसिल कर दिया जाएगा। ईनाम का लालच ब्लॉगर्स के ज़मीर को मारे डाल रहा है। यह भी आत्मा का हनन है और आत्महत्या का एक भयानक प्रकार है, जिसे केवल ज्ञानचक्षु संपन्न व्यक्ति ही देख सकता है।
ख़ैर हमें क्या हमें तो अपने लिए ‘रोटी-पानी‘ का जुगाड़ करना है। बच्चे भी बहुत दिनों से कहीं बाहर नहीं गए हैं, सो इस बहाने वे भी घूम आएंगे और बड़ा जामवड़ा देखकर सोचेंगे कि हमारे पापा ज़रूर बहुत बड़ा काम कर रहे होंगे। बड़े काम का पता बड़े जमावड़े से ही तो चलता है, चाहे उनमें से ज़्यादातर के ज़मीर मुर्दा ही क्यों न हों।
दृढ़ निश्चय करके अपनी आवाज़ को खुशगवार सा बनाकर हमने अपनी पत्नी को आवाज़ आवाज़ दी-‘ अजी, सुनती हो ?, कहां हो ?‘
उधर से बिना देर किए तुरंत ही आवाज़ आई-‘क्या आप मेरी कभी सुनते हो इस ब्लॉगिंग के चक्कर में ? और मैं होऊंगी कहां ? तुमने कौन सी हवेली बनाकर दे रखी है मुझे ? यहीं रसोई में अपने दीदे फोड़ रही हूं और अपनी तक़दीर को रो रही हूं।‘
उनके इस अचानक हमले से मैं अचकचाकर रह गया और उसके बाद जो वार्तालाप हुआ उसने तो वाक़ई मेरी तीसरी आंख भी खोल दी और मुझे यक़ीन हो गया कि अगर किसी को बड़ा ब्लॉगर बनना है तो उसे औरत की अक्ल  से सोचना चाहिए, क्योंकि औरतों की छठी इंद्रिय बहुत तेज़ होती है।   (...जारी)