Sunday, June 12, 2011

डर को जीत कर ही लिखता है 'बड़ा ब्लॉगर'

'How to stop worring and start living ?' में डेल कारनेगी जी ने चिँता और तनाव से मुक्ति पाने के बहुत से तरीक़े बताए हैं । उनमें से एक तरीक़ा यह है कि आदमी जो भी कारोबार , नौकरी या आंदोलन कर रहा है । उसमें बुरे से भी बुरा जो कुछ संभव हो , अपने लिए उसकी कल्पना करे और अपने मन को उस नुक़्सान को सहने के लिए तैयार कर ले । यह आसान नहीं है लेकिन जैसे ही आदमी यह अभ्यास करता है वैसे ही वह डर से आगे निकल कर वहाँ पहुँच जाता है जहाँ जीत है ।
ब्लॉगिंग करने वालों का जीवन पहले से ही कई तरह के तनाव से भरा होता है । उससे मुक्ति पाने के लिए वे ब्लॉगिंग शुरू करते हैं लेकिन यहाँ सुख के साथ कम या ज्यादा कुछ न कुछ दुख और चिंता उन पर और सवार हो जाती है । नज़रिए का अंतर भी यहाँ आम बात है और बदतमीज़ी भी ।
'कौन बनेगा सर्वेसर्वा ?' की कोशिश में यहाँ गुट भी बने हुए हैं और गुट बनते ही गुटबाज़ी के लिए हैं । गुटबाज़ी से टकराव और टकराव से केवल तनाव पैदा होता है । जो बदमाश है वह यहाँ धमकियाँ देता है कि जान से मार दूँगा और जो क़ानून का जानकार है वह क़ानूनी लक्ष्मण रेखा खींचता रहता है कि कौन ब्लॉगर क्या कर सकता है और क्या नहीं ?
ग़ुंडा हो या वकील , काम दोनों डराने का ही करते हैं।
डराता कौन है ?
याद रखिए जो ख़ुद डरा हुआ होता है वही दूसरों को डराता है । अपना डर छिपाने और दूसरों को डराने की कोशिश तनाव को जन्म देती है । ऐसी कोशिशें छोटेपन का लक्षण होती हैं।
बड़ा ब्लॉगर निर्भय होता है। वह मानता है कि उसका परिवार , उसका रोज़गार और उसका जीवन जो कुछ भी उसके पास है वह उनमें से किसी भी चीज़ का मालिक नहीं है । इन सब चीजों का मालिक वास्तव में सच्चा मालिक है और वह स्वयं तो केवल एक अमानतदार है । वह इन चीजों को लेने में भी मजबूर है और इन्हें देने में भी ।
जो चीज़ उसे दी गई है वह उससे एक दिन ले ली जाएगी । मालिक
दुनिया में निमित्त और सबब के तौर पर चाहे किसी दुश्मन को ही इस्तेमाल क्यों न करे लेकिन होता वही है जो मालिक का हुक्म होता है ।
सत्य और असत्य के इस संघर्ष में सब कुछ ईश्वर की योजना के अनुसार ही होता है लेकिन आदमी अपने विवेक का ग़लत इस्तेमाल करके खुद को सच्चे मालिक और मानवता का मुजरिम बना लेता है ।
यह तत्व की बात है और जो तत्व को जानता है उसे कोई चीज़ कभी नहीं डराती।
याद रखिए , चीज़ें ,घटनाएं और आदमी आपको नहीं डरातीं बल्कि आपको डराता है उन्हें देखने का नज़रिया।
ज्ञान आता है तो डर ख़ुद ब ख़ुद चला जाता है और जैसे ही डर से मुक्ति मिलती है आदमी बड़ा ब्लॉगर बन जाता है ।

9 comments:

akhtar khan akela said...

vaah anvar bhaai bdhe banne kaa kyaa faarmulaa sujhaya hai taarkik or sahi hai ..akhtr khan akela kota rajsthan

DR. ANWER JAMAL said...

@ शुक्रिया जनाब अख़तर ख़ान साहब .

शालिनी कौशिक said...

bahut achchha likha hai.good.

शालिनी कौशिक said...

dr.sahab aapke blog ko ye blog achchha laga par le rahi hoon aur aapko bata bhi rahi hoon taki aap ye n kah saken ki bataya nahi.aap apni upasthti se anugrahit karenge aisee aasha hai.aabhar.

शिखा कौशिक said...

ye blog achchha laga par aapke blog ka parichay prapt huaa .bahut achchha blog hai par koi bhi kisi aur ko nidar nahi bana sakta .ye shakti apne bheetar swayam paida karni hoti hai .

DR. ANWER JAMAL said...

ब्लॉग जगत की जानी -मानी हस्ती -डॉ .अनवर जमाल जी से मिलेंगे ?
@ शालिनी जी ! हमने ‘ये ब्लॉग अच्छा लगा‘ पर जाकर देखा कि वहां आपकी पोस्ट भी है और आपकी पोस्ट शिखा जी की टिप्पणी भी है। मतलब सोने पर सुहागा ।
आप दोनों विदुषी बालाओं की निर्मल विचार गंगा हमारे अंतःकरण को पवित्र और सुगंधित करती जा रही है ।
हम आपके शुक्रगुज़ार हैं ।

इस अवसर पर हम आपको विशेष आशीष देते हैं !

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') said...

आप जैसा बड़ा ब्‍लॉगर ब्‍लॉग जगत में आ ही गया है, तो अब हम जैसे छोटे ब्‍लॉगर भी कुछ न कुछ सीख ही‍ लेंगे।

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हॉट मॉडल केली ब्रुक...
नदी : एक चिंतन यात्रा।

कुमार राधारमण said...

इस पोस्ट की कई बातें विचारणीय हैं।

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

लीगल सैल से मिले वकील की मैंने अपनी शिकायत उच्चस्तर के अधिकारीयों के पास भेज तो दी हैं. अब बस देखना हैं कि-वो खुद कितने बड़े ईमानदार है और अब मेरी शिकायत उनकी ईमानदारी पर ही एक प्रश्नचिन्ह है

मैंने दिल्ली पुलिस के कमिश्नर श्री बी.के. गुप्ता जी को एक पत्र कल ही लिखकर भेजा है कि-दोषी को सजा हो और निर्दोष शोषित न हो. दिल्ली पुलिस विभाग में फैली अव्यवस्था मैं सुधार करें

कदम-कदम पर भ्रष्टाचार ने अब मेरी जीने की इच्छा खत्म कर दी है.. माननीय राष्ट्रपति जी मुझे इच्छा मृत्यु प्रदान करके कृतार्थ करें मैंने जो भी कदम उठाया है. वो सब मज़बूरी मैं लिया गया निर्णय है. हो सकता कुछ लोगों को यह पसंद न आये लेकिन जिस पर बीत रही होती हैं उसको ही पता होता है कि किस पीड़ा से गुजर रहा है.

मेरी पत्नी और सुसराल वालों ने महिलाओं के हितों के लिए बनाये कानूनों का दुरपयोग करते हुए मेरे ऊपर फर्जी केस दर्ज करवा दिए..मैंने पत्नी की जो मानसिक यातनाएं भुगती हैं थोड़ी बहुत पूंजी अपने कार्यों के माध्यम जमा की थी.सभी कार्य बंद होने के, बिमारियों की दवाइयों में और केसों की भागदौड़ में खर्च होने के कारण आज स्थिति यह है कि-पत्रकार हूँ इसलिए भीख भी नहीं मांग सकता हूँ और अपना ज़मीर व ईमान बेच नहीं सकता हूँ.